एक बार खारिज होकर अंतिम रूप ले चुकी डिम्ड कन्वेयंस अर्जी दोबारा दाखिल नहीं की जा सकती: बॉम्बे हाईकोर्ट
बॉम्बे हाईकोर्ट ने महाराष्ट्र ओनरशिप फ्लैट्स अधिनियम के तहत महत्वपूर्ण फैसला सुनाते हुए कहा कि यदि डिम्ड कन्वेयंस के लिए दायर की गई पहली अर्जी खारिज हो चुकी हो और उस आदेश को चुनौती न दिए जाने के कारण वह अंतिम रूप ले चुका हो, तो उसी राहत के लिए दूसरी अर्जी दाखिल नहीं की जा सकती।
अदालत ने स्पष्ट किया कि सक्षम प्राधिकारी के पास अपने ही आदेश की समीक्षा या पुनर्विचार करने की कोई अंतर्निहित शक्ति नहीं है। जब तक कानून में ऐसी शक्ति स्पष्ट रूप से प्रदान न की गई हो, तब तक पहले से तय हो चुके मुद्दे को दोबारा नहीं खोला जा सकता।
जस्टिस फरहान पी. दुबाश एक सहकारी गृहनिर्माण संस्था के पक्ष में पारित डिम्ड कन्वेयंस आदेश को चुनौती देने वाली याचिका पर सुनवाई कर रहे थे।
मामले में विवाद तब उत्पन्न हुआ, जब संबंधित संस्था ने पहले डिम्ड कन्वेयंस के लिए आवेदन किया, जिसे 4 अगस्त 2016 को सक्षम प्राधिकारी ने खारिज कर दिया था। खारिजी का आधार यह था कि उसी भूखंड और कन्वेयंस अधिकारों से संबंधित एक दीवानी वाद पहले से लंबित था।
हालांकि, उस समय सक्षम प्राधिकारी ने यह छूट दी थी कि दीवानी वाद का फैसला आने के बाद संस्था नई अर्जी दाखिल कर सकती है। इस आदेश को किसी भी पक्ष ने चुनौती नहीं दी और वह अंतिम रूप ले गया। वहीं दीवानी वाद भी लंबित रहा।
इसके बावजूद, संस्था ने 3 जनवरी 2017 को दूसरी डिम्ड कन्वेयंस अर्जी दाखिल कर दी, जिस पर सुनवाई के बाद उसके पक्ष में डिम्ड कन्वेयंस मंजूर कर दिया गया।
याचिकाकर्ता विकासकर्ता और अन्य सहकारी गृहनिर्माण संस्था ने तर्क दिया कि दूसरी अर्जी सुनवाई योग्य ही नहीं है, क्योंकि पहली अर्जी खारिज करने वाला आदेश अंतिम रूप ले चुका है और उसमें लगाई गई शर्त भी पूरी नहीं हुई।
हाईकोर्ट ने पाया कि पहले आदेश में स्पष्ट रूप से कहा गया कि नई अर्जी केवल लंबित दीवानी वाद के निपटारे के बाद ही दायर की जा सकती है। चूंकि दीवानी वाद अब भी लंबित है और पहले आदेश को चुनौती भी नहीं दी गई, इसलिए सभी पक्ष उस आदेश से बंधे हुए हैं।
अदालत ने यह भी कहा कि दोनों अर्जियों में पक्षकार, विषय-वस्तु और मूल तथ्य पूरी तरह समान है। पहली अर्जी खारिज करने का आधार बना दीवानी वाद भी अब तक लंबित है। ऐसे में "पूर्व निर्णय की बाध्यता" और कार्यवाही की अंतिमता के सिद्धांत पूरी तरह लागू होते हैं।
हाईकोर्ट ने कहा कि दूसरी अर्जी में उठाए गए आधार वास्तव में पहले आदेश की वैधता और सही होने पर सवाल उठाने का प्रयास है। यह कोई नया तथ्य या बदली हुई परिस्थिति नहीं है बल्कि पहले से तय मुद्दे पर पुनर्विचार की मांग है।
अदालत ने कहा,
"मोफा की धारा 11 अथवा किसी अन्य संबंधित प्रावधान के तहत सक्षम प्राधिकारी को समीक्षा का अधिकार नहीं दिया गया। डिम्ड कन्वेयंस की कार्यवाही संक्षिप्त प्रकृति की होती है, जिसका उद्देश्य विकासकर्ता पर कानून द्वारा लगाए गए दायित्वों को लागू करना है। सक्षम प्राधिकारी को न तो अपीलीय अधिकार प्राप्त हैं और न ही समीक्षा के अधिकार।"
हाईकोर्ट ने माना कि पहली अर्जी खारिज करने वाला आदेश प्रभावी रहते हुए और परिस्थितियों में कोई बदलाव न होने के बावजूद दूसरी अर्जी पर विचार करके सक्षम प्राधिकारी ने ऐसी समीक्षा शक्ति का प्रयोग किया, जिसे कानून मान्यता नहीं देता।
इसी आधार पर अदालत ने कहा कि दूसरी डिम्ड कन्वेयंस अर्जी कानूनन बाधित थी और उस पर विचार करने का अधिकार सक्षम प्राधिकारी के पास नहीं था। परिणामस्वरूप, सहकारी गृहनिर्माण संस्था के पक्ष में पारित डिम्ड कन्वेयंस आदेश रद्द कर दिया गया।