अनैतिक व्यापार निवारण अधिनियम: परिवार न होने के आधार पर वयस्क पीड़िता को संरक्षण गृह में नहीं रखा जा सकता: बॉम्बे हाइकोर्ट
बॉम्बे हाइकोर्ट ने महत्वपूर्ण व्यवस्था देते हुए कहा कि अनैतिक व्यापार (निवारण) अधिनियम, 1956 का उद्देश्य यौन शोषण की शिकार महिलाओं को दंडित करना नहीं है। अदालत ने ऐसी महिला को तुरंत रिहा करने का आदेश दिया, जिसे पुलिस छापे के दौरान बचाया गया लेकिन इस आधार पर जबरन संरक्षण गृह भेज दिया गया कि उसका कोई परिवार या आय का साधन नहीं है।
जस्टिस निजामुद्दीन जमादार ने मजिस्ट्रेट का आदेश रद्द कर दिया, जिसमें महिला को एक वर्ष के लिए संरक्षण गृह में रखने का निर्देश दिया गया था। कोर्ट ने स्पष्ट किया कि किसी बालिग महिला को उसकी इच्छा के विरुद्ध केवल इसलिए हिरासत में नहीं रखा जा सकता, क्योंकि वह अकेली है।
इस मामले में मजिस्ट्रेट ने पीड़िता को संरक्षण गृह भेजते समय यह तर्क दिया कि उसके माता-पिता अलग हो चुके हैं। उसका ध्यान रखने वाला कोई रिश्तेदार नहीं है, जिससे उसके दोबारा अनैतिक कार्यों में शामिल होने की आशंका है। दिलचस्प बात यह है कि उसी छापे में बचाई गई चार अन्य महिलाओं को मजिस्ट्रेट ने केवल इसलिए रिहा कर दिया, क्योंकि उनके रिश्तेदारों ने उनकी जिम्मेदारी लेने की बात कही थी।
हाइकोर्ट ने इस भेदभावपूर्ण रवैये पर टिप्पणी करते हुए कहा कि किसी व्यक्ति की व्यक्तिगत स्वतंत्रता और मौलिक अधिकारों को केवल इसलिए नहीं छीना जा सकता, क्योंकि उसके पास सामाजिक या पारिवारिक सहारा नहीं है।
जस्टिस जमादार ने अपने फैसले में कहा कि जब तक इस बात के पुख्ता प्रमाण न हों कि पीड़िता समाज के लिए खतरा है या वह किसी गंभीर संक्रामक बीमारी से पीड़ित है, तब तक उसे हिरासत में रखना अनुचित है।
अदालत ने माना कि ट्रायल कोर्ट ने इस मुद्दे को गलत नजरिए से देखा और केवल रिश्तेदारों की अनुपस्थिति के आधार पर महिला की स्वतंत्रता को बाधित कर दिया। कोर्ट ने रेखांकित किया कि बालिग होने के नाते महिला को यह तय करने का अधिकार है कि वह कहां रहना चाहती है और प्रशासन उसे सुधार या सुरक्षा के नाम पर जबरन कैद नहीं कर सकता।
अदालत ने अंततः महिला को तत्काल प्रभाव से रिहा करने का निर्देश दिया। हाइकोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया कि अनैतिक व्यापार निवारण अधिनियम को पीड़ितों के विरुद्ध हथियार के रूप में उपयोग नहीं किया जाना चाहिए। इस निर्णय से यह साफ हो गया कि आर्थिक अभाव या परिवार का न होना किसी नागरिक की संवैधानिक स्वतंत्रता को सीमित करने का कानूनी आधार नहीं बन सकता।