हाइपरटेंशन, डायबिटीज़ को 'लाइफस्टाइल डिज़ीज़' बताकर सैन्य कर्मियों को दिव्यांगता पेंशन से वंचित नहीं किया जा सकता: बॉम्बे हाइकोर्ट

Update: 2026-01-30 09:22 GMT

बॉम्बे हाइकोर्ट ने यह स्पष्ट किया कि हाइपरटेंशन, डायबिटीज़, स्पॉन्डिलाइटिस जैसी बीमारियों को केवल 'लाइफस्टाइल' या 'संवैधानिक' रोग बताकर सशस्त्र बलों के कर्मियों को दिव्यांगता पेंशन से वंचित नहीं किया जा सकता। हाइकोर्ट ने सशस्त्र बल अधिकरण (AFT), मुंबई का निर्णय बरकरार रखा, जिसमें सेना और नौसेना के कर्मियों को यह मानते हुए दिव्यांगता पेंशन देने का निर्देश दिया गया कि ये बीमारियां उनकी सेवा के दौरान उत्पन्न हुईं या सेवा की परिस्थितियों के कारण बढ़ीं।

चीफ जस्टिस श्री चंद्रशेखर और जस्टिस गौतम अंखाड की खंडपीठ ने कहा कि पेंशन कोई सरकारी कृपा या दया नहीं है, बल्कि यह पूर्व में दी गई निष्ठावान सेवाओं का प्रतिफल है और सामाजिक-आर्थिक न्याय का एक महत्वपूर्ण साधन है। हाइकोर्ट ने कहा कि उम्र बढ़ने के साथ जब शारीरिक और मानसिक क्षमताएं कम होने लगती हैं, तब पेंशन व्यक्ति को आर्थिक सुरक्षा प्रदान करती है।

कोर्ट ने कहा कि मेडिकल आधार पर सेवा से बाहर किए गए सैन्य कर्मी जो अब अपनी ड्यूटी निभाने में असमर्थ हैं, वे दिव्यांगता पेंशन के हकदार हैं। सरकार यह नहीं कह सकती कि पेंशन उसकी मर्जी पर निर्भर है, क्योंकि पेंशन एक मूल्यवान अधिकार है, जो सरकारी सेवक में निहित होता है।

केंद्र सरकार और उसके मेडिकल बोर्ड्स की इस दलील को हाइकोर्ट ने खारिज कर दिया कि मोटापा, डायबिटीज़ या हाइपरटेंशन जैसी बीमारियाँ केवल 'लाइफस्टाइल' या 'संवैधानिक' रोग हैं। कोर्ट ने कहा कि नियम बनाने वालों की मंशा यह नहीं हो सकती कि यदि कोई बीमारी सैन्य सेवा के दौरान उत्पन्न हो या सेवा की कठिन परिस्थितियों से बढ़े तो केवल उसे 'संवैधानिक' बताकर दिव्यांगता पेंशन से इनकार कर दिया जाए। हाइकोर्ट ने यह भी कहा कि यह अपेक्षा करना अव्यावहारिक है कि कोई सैनिक यह साबित करे कि उसे हाइपरटेंशन जैसी बीमारी सैन्य ड्यूटी की कठोर परिस्थितियों के कारण ही हुई।

कोर्ट ने विशेष रूप से उल्लेख किया कि हाइपरटेंशन सेना और नौसेना द्वारा अधिसूचित बीमारी है, जिसे दिव्यांगता पेंशन के लिए मान्यता प्राप्त है। ऐसे में केवल मेडिकल बोर्ड की राय के आधार पर पेंशन से इनकार करना उचित नहीं है।

अपने विस्तृत निर्णय में हाइकोर्ट ने कहा कि ट्रिब्यूनल का दायित्व है कि वह कल्याणकारी नियमों की व्याख्या उदारतापूर्वक करे, न कि तकनीकी आधारों पर लाभ को सीमित करे। हाइकोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया कि अनुच्छेद 226 के तहत हस्तक्षेप तभी किया जा सकता है, जब ट्रिब्यूनल का निर्णय प्रासंगिक तथ्यों की अनदेखी या अप्रासंगिक तथ्यों पर आधारित होकर विकृत हो, जो इस मामले में नहीं पाया गया।

इस प्रकरण में लेफ्टिनेंट कर्नल एस.के. राठौर का मामला प्रमुख था, जिन्होंने लगभग 23 वर्षों तक सेना में सेवा दी और लद्दाख तथा मणिपुर जैसे ऑपरेशनल क्षेत्रों में तैनात रहे। वर्ष 2003 में उन्हें 'लो मेडिकल कैटेगरी' में सेवा से मुक्त किया गया। हालांकि मेडिकल बोर्ड ने डायबिटीज़ को संवैधानिक रोग बताया, लेकिन AFT ने यह माना कि यह बीमारी सेवा की परिस्थितियों के कारण बढ़ी और उन्हें दिव्यांगता पेंशन का हकदार ठहराया।

केंद्र सरकार ने दलील दी थी कि मेडिकल बोर्ड की राय अंतिम मानी जानी चाहिए और शांति क्षेत्र में पाई गई लाइफस्टाइल बीमारियों को स्वतः सैन्य सेवा से जोड़कर नहीं देखा जा सकता। हाइकोर्ट ने इस तर्क को अस्वीकार करते हुए कहा कि AFT के निर्णय में कोई कानूनी त्रुटि नहीं है।

अंततः बॉम्बे हाइकोर्ट ने केंद्र सरकार द्वारा दायर सभी याचिकाओं को खारिज करते हुए सेना और नौसेना के कर्मियों को दी गई दिव्यांगता पेंशन के आदेशों को बरकरार रखा।

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