अगर जमानत नहीं मिलती है तो JJB को बच्चों को ऑब्जर्वेशन होम भेजने के लिए स्पष्ट आदेश देने होंगे: आंध्र प्रदेश हाईकोर्ट
आंध्र प्रदेश हाईकोर्ट ने राज्य के किशोर न्याय बोर्डों (JJB) को निर्देश दिया कि वे यह सुनिश्चित करें कि जिन बच्चों पर कानून तोड़ने का आरोप है, उन्हें जांच के दौरान ऑब्जर्वेशन होम या किसी सुरक्षित जगह पर रखा जाए, खासकर तब जब उन्हें जमानत न मिली हो।
कोर्ट ने यह निर्देश तीन बच्चों की बुआ द्वारा दायर 'हेबियस कॉर्पस' (Habeas Corpus) याचिका खारिज करते हुए दिए। याचिकाकर्ता का आरोप है कि किशोर न्याय बोर्ड (JJB) द्वारा बच्चों को आगे की कार्यवाही के लिए वापस पुलिस को सौंपे जाने के बाद उन्हें अवैध रूप से हिरासत में रखा गया।
जस्टिस रवि नाथ तिलहरी और जस्टिस अलापति गिरिधर की खंडपीठ ने कहा:
“इस मामले के तथ्यों और परिस्थितियों को देखते हुए फैसला सुनाने से पहले हम निम्नलिखित निर्देश जारी करते हैं:
A) आंध्र प्रदेश राज्य के सभी किशोर न्याय बोर्डों (JJB) को यह सुनिश्चित करना होगा कि जब कानून तोड़ने के आरोपी किसी बच्चे को बोर्ड के सामने पेश किया जाए और उसे जमानत न मिले तो जांच के दौरान उसे ऑब्जर्वेशन होम या किसी सुरक्षित स्थान पर रखने के लिए स्पष्ट आदेश दिए जाएं। JJB को बच्चों को केवल पुलिस के हवाले नहीं कर देना चाहिए, जिससे यह तय करने की पूरी छूट पुलिस के पास चली जाए कि जांच के दौरान बच्चे को कहाँ रखा जाए।
B) महिला, बाल, दिव्यांग और वरिष्ठ नागरिक (JJ & Genl) विभाग के प्रधान सचिव को यह सुनिश्चित करना होगा कि हर जिले में पर्याप्त संख्या में ऑब्जर्वेशन होम हों—कम-से-कम एक तो हर जिले में होना ही चाहिए। हालांकि, JJ Act (किशोर न्याय अधिनियम) में कई जिलों के लिए साझा ऑब्जर्वेशन होम का प्रावधान भी है, लेकिन कानूनी आवश्यकताओं को देखते हुए यह बेहतर होगा कि हर जिले में कम से कम एक ऑब्जर्वेशन होम जरूर हो।”
इस मामले में कोर्ट ने माना कि पुलिस ने तीनों बच्चों को मान्यता प्राप्त सुरक्षित संस्थानों में रखकर कोई गैर-कानूनी काम नहीं किया। भले ही JJB ने बच्चों को आगे की कार्यवाही के लिए पुलिस को वापस सौंप दिया, लेकिन उसने यह स्पष्ट नहीं किया कि जांच के दौरान उन्हें कहाँ रखा जाना चाहिए।
ये निर्देश 'जुवेनाइल जस्टिस एक्ट, 2015' (किशोर न्याय अधिनियम, 2015) की धारा 10 और 12 से लिए गए। धारा 10 के अनुसार, कानून का उल्लंघन करने के आरोपी बच्चे को पकड़े जाने के 24 घंटे के भीतर बोर्ड के सामने पेश करना अनिवार्य है। साथ ही इस धारा के तहत बच्चे को पुलिस लॉकअप या जेल में रखना मना है। धारा 12 में जमानत का प्रावधान है और यह कहती है कि अगर किसी बच्चे को रिहा नहीं किया जाता है तो उसे 'ऑब्जर्वेशन होम' (निरीक्षण गृह) या किसी सुरक्षित स्थान पर रखा जाना चाहिए।
यह मामला पुलिस द्वारा 31 जुलाई को दर्ज किए गए आपराधिक मामले से जुड़ा है, जिसमें कानून का उल्लंघन करने के आरोपी तीन बच्चों को नामजद किया गया। इन बच्चों को 2 अगस्त को दंगा करने, हत्या की कोशिश करने और खतरनाक हथियारों से चोट पहुंचाने (BNS के तहत) के आरोपों में पकड़ा गया। 3 अगस्त को उन्हें JJB (किशोर न्याय बोर्ड) के सामने पेश किया गया।
बोर्ड ने जांच अधिकारी को निर्देश दिया कि वे बच्चों की उम्र का सबूत पेश करें और उन्हें दोबारा बोर्ड के सामने लाएं। जब 5 अगस्त को बच्चों को पेश किया गया तो बोर्ड ने अधिकारी को निर्देश दिया कि वे अगले दिन बच्चों को बोर्ड के अध्यक्ष के सामने लाएं, ताकि जरूरी आदेश दिए जा सकें।
इस बीच एक बच्चे को गुंटूर के 'सखी वन स्टॉप सेंटर' में रखा गया, जबकि बाकी दो बच्चों को 'मातृ श्री चिल्ड्रेन्स होम' में रखा गया।
6 अगस्त को उम्र निर्धारण टेस्ट से पता चला कि बच्चों में से एक की उम्र लगभग 15 से 16 साल है। इसके बाद JJB ने निर्देश दिया कि तीनों बच्चों को सुरक्षित कस्टडी में रखा जाए। लड़की को विशाखापत्तनम के 'सरकारी गर्ल्स ऑब्जर्वेशन होम' में भेजा गया, जबकि दोनों लड़कों को विजयवाड़ा के 'सरकारी बॉयज ऑब्जर्वेशन होम' में भेज दिया गया।
इस दौरान अपनी कस्टडी को चुनौती देते हुए याचिकाकर्ता ने तर्क दिया कि बोर्ड ने ऐसा कोई विशेष आदेश नहीं दिया, जिससे पुलिस को बच्चों को अपने पास रखने या उन्हें किसी संस्थान में भेजने का अधिकार मिले। उन्होंने दलील दी कि बच्चों को लगातार कस्टडी में रखना गैर-कानूनी है और उन्हें या तो रिहा कर दिया जाना चाहिए या उनके अभिभावकों को सौंप दिया जाना चाहिए।
वहीं, राज्य सरकार की ओर से कहा गया कि JJB के सामने पेश किए जाने के बाद बच्चों को पुलिस कस्टडी में नहीं रखा गया। इसके बजाय, बोर्ड के अगले आदेश आने तक उनकी देखभाल और सुरक्षा के लिए उन्हें मान्यता प्राप्त सुरक्षित संस्थानों में रखा गया। इन दलीलों पर विचार करते हुए, कोर्ट ने गौर किया कि भले ही JJB ने बच्चों को आगे पेश करने के लिए पुलिस को वापस सौंप दिया, लेकिन उसने न तो उन्हें जमानत दी और न ही रिमांड की अर्जी खारिज की। बोर्ड के आदेशों के अनुसार, बच्चों को बाद की किसी तारीख पर फिर से पेश किया जाना था।
ऐसी स्थिति में बेंच ने कहा कि जमानत न मिलने पर बच्चों को किसी ऑब्जर्वेशन होम या सुरक्षित स्थान पर रखा जाना चाहिए। हालांकि, गुंटूर में लड़कों के लिए कोई चिल्ड्रेन्स होम न होने की बात को ध्यान में रखते हुए बोर्ड ने उन्हें कहाँ रखा जाए, इस बारे में कोई स्पष्ट आदेश नहीं दिया।
अदालत ने कहा,
"जब तक ज़मानत न मिल जाए, तब तक पुलिस कानून के दायरे में आने वाले बच्चों को रिहा नहीं कर सकती। यहां तक कि तब भी नहीं, जब JJB (किशोर न्याय बोर्ड) के आदेश पर उन्हें दोबारा JJB के सामने पेश करने के लिए पुलिस को वापस सौंप दिया गया हो। इन बच्चों को पहले ही 24 घंटे के भीतर JJB के सामने पेश किया जा चुका था। अगर उन्हें 24 घंटे के भीतर पेश नहीं किया गया होता तो निश्चित रूप से उनकी रिहाई का आदेश दिया जा सकता था।"
खंडपीठ ने आगे बताया कि बच्चों के माता-पिता या अभिभावक बोर्ड के सामने पेश नहीं हुए। चूंकि बच्चों को दोबारा पेश किया जाना था और उन्हें ज़मानत नहीं मिली थी, इसलिए पुलिस अपनी मर्ज़ी से उन्हें रिहा नहीं कर सकती थी।
अदालत ने स्पष्ट किया कि अगर बच्चों को पकड़े जाने के 24 घंटे के भीतर बोर्ड के सामने पेश नहीं किया गया होता तो स्थिति अलग होती। ऐसी स्थिति में उनकी रिहाई का आदेश दिया जा सकता था।
इन परिस्थितियों में पुलिस की कार्रवाई को सही ठहराते हुए पीठ ने ज़ोर देकर कहा कि JJB को बच्चों को कहां रखा जाए, इसके लिए स्पष्ट आदेश जारी करने चाहिए; यह फैसला पुलिस पर नहीं छोड़ना चाहिए।
अदालत ने राज्य सरकार को यह सुनिश्चित करने का भी निर्देश दिया कि पर्याप्त 'ऑब्जर्वेशन होम' (निरीक्षण गृह) हों - कोशिश यह हो कि हर ज़िले में कम से कम एक ऐसा केंद्र हो - ताकि जाँच पूरी होने तक बच्चों को सुरक्षित रखा जा सके।
'हेबियस कॉर्पस' (बंदी प्रत्यक्षीकरण) याचिका में कोई दम न पाते हुए खंडपीठ ने इसे खारिज किया।
Case Title : Kethavath Jyothi v. State of Andhra Pradesh & Ors