मानव जीवन की रक्षा को लेकर पुलिस की संवेदनशीलता अब भी बेहद कम: हाईकोर्ट ने बदायूं SSP को लगाई फटकार
इलाहाबाद हाईकोर्ट ने नागरिकों की सुरक्षा को लेकर पुलिस के रवैये पर कड़ी नाराजगी जताते हुए कहा कि राज्य की पहली जिम्मेदारी मानव जीवन बचाना है केवल अपराध होने के बाद अपराधियों को सजा दिलाना नहीं।
जस्टिस जे.जे. मुनीर और जस्टिस तरुण सक्सेना की खंडपीठ ने तीखी टिप्पणी करते हुए कहा कि कानून-व्यवस्था एजेंसियों की मानव जीवन की रक्षा को लेकर संवेदनशीलता हमेशा कम रही है और आज भी वैसी ही बनी हुई है।
अदालत ने ये टिप्पणियां बदायूं की सीनियर पुलिस अधीक्षक द्वारा दाखिल हलफनामे पर असंतोष जताते हुए कीं।
मामला ननकराम नामक व्यक्ति की याचिका से जुड़ा है। याचिकाकर्ता ने हाइकोर्ट को बताया कि पारिवारिक जमीन विवाद को लेकर उसे पांच लोगों से जान का गंभीर खतरा है। उसने पहले सीनियर पुलिस अधीक्षक से सुरक्षा मांगी थी लेकिन पुलिस की ओर से कथित तौर पर उदासीन रवैया अपनाया गया।
इसके बाद उसने हाईकोर्ट में याचिका दायर कर सुरक्षा और आरोपियों के खिलाफ FIR दर्ज करने की मांग की।
अदालत ने 6 अप्रैल को सुनवाई के दौरान SSP को व्यक्तिगत हलफनामा दाखिल कर यह बताने का निर्देश दिया कि याचिकाकर्ता की खतरे की आशंका का आकलन करने और सुरक्षा देने के लिए क्या कदम उठाए गए।
हालांकि, 4 मई को जब अदालत ने हलफनामे का अवलोकन किया तो उसे टालमटोल वाला बताया। कोर्ट ने कहा कि हलफनामे में केवल विवाद की पृष्ठभूमि और दोनों पक्षों के खिलाफ भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता (BNSS) की धाराओं 170, 126 और 135 के तहत की गई निवारक कार्रवाई का जिक्र है।
अदालत ने कटाक्ष करते हुए कहा कि लगता है। मामले की गंभीरता को समझने का काम किसी दरोगा की बुद्धिमत्ता पर छोड़ दिया गया।
हलफनामे में यह भी कहा गया कि आरोपियों के खिलाफ FIR दर्ज कर आरोपपत्र दाखिल किया जा चुका है और गांव में बीट कांस्टेबलों को गश्त के निर्देश दिए गए। पुलिस ने यह भी कहा कि गांव में शांति है और विवाद केवल जमीन बंटवारे और पारिवारिक दुश्मनी का है।
इस पर हाईकोर्ट ने कहा,
“अपराध का होना एक अलग बात है, शांति व्यवस्था बनाए रखना दूसरी, लेकिन याचिकाकर्ता द्वारा जताया गया जान का खतरा बिल्कुल अलग मुद्दा है। इस संबंध में वरिष्ठ पुलिस अधीक्षक का रवैया उदासीन दिखाई देता है।”
कोर्ट ने आगे कहा,
“यदि कल याचिकाकर्ता को गोली मार दी जाए या उसके साथ कोई गंभीर हमला हो जाए तो BNSS के तहत शुरू की गई कार्यवाही उसे वापस जीवन नहीं दे सकती।”
खंडपीठ ने कहा कि इलाज से बेहतर रोकथाम का सिद्धांत यहां लागू होता है। अदालत ने कहा कि अपराध होने के बाद अपराधियों के खिलाफ मुकदमा चलाना केवल प्रतिशोधात्मक कार्रवाई है, जिससे पीड़ित की जान वापस नहीं आ सकती।
कोर्ट ने टिप्पणी की,
“अपराधियों को सजा देना अलग बात है। सिद्धांत रूप में कहा जा सकता है कि इससे भविष्य के अपराध रुकेंगे लेकिन अनुभव बताता है कि ऐसा शायद ही होता है।”
अदालत ने कहा कि बदायूं एसएसपी की प्रतिक्रिया अपेक्षित स्तर से “काफी नीचे” रही। इसके बाद कोर्ट ने उन्हें नया हलफनामा दाखिल करने का निर्देश दिया, जिसमें यह बताया जाए कि याचिकाकर्ता की सुरक्षा के लिए क्या ठोस कदम उठाए जाएंगे।
हाईकोर्ट ने कहा कि यदि पुलिस उचित कदम उठाए तो अदालत को सुरक्षा संबंधी आदेश जारी करने जैसी अप्रिय स्थिति से बचाया जा सकता है।
मामले की अगली सुनवाई 13 मई को होगी।