तत्काल इनाम या प्रमोशन नहीं, घायल को अनिवार्य इलाज और FIR जरूरी: इलाहाबाद हाइकोर्ट ने एनकाउंटर संस्कृति पर कसी नकेल

Update: 2026-01-31 10:59 GMT

इलाहाबाद हाइकोर्ट ने उत्तर प्रदेश में बढ़ती पुलिस FIR संस्कृति पर सख्त रुख अपनाते हुए स्पष्ट निर्देश जारी किए। हाइकोर्ट ने कहा कि किसी भी पुलिस एनकाउंटर के तुरंत बाद पुलिसकर्मियों को न तो आउट ऑफ टर्न प्रमोशन दिया जाएगा और न ही वीरता पुरस्कार।

साथ ही एनकाउंटर की हर घटना में अलग से FIR दर्ज करना, घायल को तत्काल मेडिकल सहायता उपलब्ध कराना और मजिस्ट्रेट या मेडिकल अधिकारी द्वारा घायल का बयान दर्ज कराना अनिवार्य होगा।

यह महत्वपूर्ण आदेश जस्टिस अरुण कुमार सिंह देशवाल की पीठ द्वारा पारित किया गया। 11 पन्नों के आदेश में हाइकोर्ट ने सुप्रीम कोर्ट द्वारा वर्ष 2016 में पीयूसीएल बनाम महाराष्ट्र राज्य मामले में जारी दिशा-निर्देशों को दोहराते हुए उन्हें सख्ती से लागू करने पर जोर दिया।

हाइकोर्ट ने कहा कि यदि किसी पुलिस एनकाउंटर में आरोपी या किसी अन्य व्यक्ति को गंभीर चोट आती है तो उस घटना के संबंध में FIR दर्ज की जानी चाहिए। यह FIR एनकाउंटर में शामिल पुलिस टीम के प्रभारी द्वारा उसी या नजदीकी थाने में दर्ज कराई जाएगी, लेकिन इसकी जांच संबंधित थाने की पुलिस नहीं करेगी।

जांच CBCID या किसी अन्य थाने की पुलिस टीम द्वारा सीनियर अधिकारी की निगरानी में की जाएगी, जो एनकाउंटर में शामिल टीम के प्रभारी से कम से कम एक स्तर ऊपर का अधिकारी होगा।

अदालत ने यह भी स्पष्ट किया कि प्रारंभिक FIR में पुलिस टीम के व्यक्तिगत सदस्यों को आरोपी के रूप में नामित करना आवश्यक नहीं होगा। केवल यह उल्लेख किया जा सकता है कि एनकाउंटर STF या नियमित पुलिस द्वारा किया गया।

हाइकोर्ट ने घायल आरोपी या पीड़ित को तुरंत मेडिकल सहायता देने को अनिवार्य बताया और कहा कि इलाज के बाद मजिस्ट्रेट या मेडिकल अधिकारी द्वारा उसकी शारीरिक स्थिति की पुष्टि करते हुए बयान दर्ज किया जाना चाहिए।

इसके बाद एनकाउंटर की विस्तृत जांच रिपोर्ट सक्षम अदालत को भेजी जाएगी, जो पीयूसीएल मामले में निर्धारित प्रक्रिया के अनुसार आगे की कार्यवाही करेगी।

अदालत ने यह भी निर्देश दिया कि किसी पुलिस एनकाउंटर के तुरंत बाद पुलिसकर्मियों को न तो आउट ऑफ टर्न प्रमोशन दिया जाएगा और न ही वीरता पुरस्कार की सिफारिश की जाएगी। ऐसे किसी भी सम्मान या इनाम पर तभी विचार किया जा सकता है, जब पुलिस प्रमुख द्वारा गठित समिति यह तय करे कि संबंधित अधिकारी की वीरता संदेह से परे सिद्ध हो चुकी है।

हाइकोर्ट ने यह भी व्यवस्था दी कि यदि घायल व्यक्ति या उसके परिजनों को लगे कि निर्धारित प्रक्रिया का पालन नहीं किया गया है, स्वतंत्र जांच नहीं हुई या पुलिस द्वारा अधिकारों का दुरुपयोग किया गया तो वे संबंधित क्षेत्राधिकार के सेशंस जज के समक्ष शिकायत दर्ज करा सकते हैं। सेशंस जज शिकायत की जांच कर उचित राहत प्रदान करेंगे और आवश्यक होने पर मामला हाइकोर्ट को भी संदर्भित कर सकते हैं।

अदालत ने चेतावनी दी कि यदि किसी जिले में पुलिस एनकाउंटर से जुड़े मामलों में सुप्रीम कोर्ट के दिशा-निर्देशों का उल्लंघन पाया गया, तो केवल एनकाउंटर टीम का नेतृत्व करने वाला अधिकारी ही नहीं, बल्कि संबंधित जिले के पुलिस प्रमुख, चाहे वह एसपी, एसएसपी या पुलिस कमिश्नर हों, अवमानना कार्यवाही के लिए भी उत्तरदायी होंगे। इसके अतिरिक्त विभागीय अनुशासनात्मक कार्यवाही भी की जा सकेगी।

इलाहाबाद हाइकोर्ट ने तथाकथित 'हाफ एनकाउंटर' या 'ऑपरेशन लंगड़ा' की प्रवृत्ति पर भी कड़ी टिप्पणी की। अदालत ने कहा कि कई मामलों में प्रथम दृष्टया यह सामने आया कि कुछ पुलिस अधिकारी सोशल मीडिया में प्रसिद्धि पाने, सीनियर अधिकारियों से प्रशंसा या आउट ऑफ टर्न प्रमोशन के उद्देश्य से अनावश्यक रूप से हथियार का प्रयोग करते हैं और आरोपी के पैर में गोली मारकर उसे अपंग बना देते हैं।

हाइकोर्ट ने ऐसे कृत्यों को कानून के विरुद्ध बताते हुए कहा कि किसी आरोपी को दंड देने का अधिकार केवल न्यायपालिका के पास है, न कि पुलिस के पास। भारत एक लोकतांत्रिक देश है और इसे संविधान के सिद्धांतों के अनुसार चलाया जाना चाहिए, जिसमें विधायिका, कार्यपालिका और न्यायपालिका की भूमिकाएं स्पष्ट रूप से अलग-अलग हैं।

अदालत ने कहा कि किसी भी बहाने से पुलिस अधिकारियों को न्यायपालिका के कार्य क्षेत्र में हस्तक्षेप करने की अनुमति नहीं दी जा सकती। किसी आरोपी को दंडित करने के उद्देश्य से, चाहे वह शरीर के गैर-घातक हिस्से पर ही क्यों न हो, अनावश्यक गोलीबारी करना स्वीकार्य नहीं है। मानव जीवन और गरिमा की रक्षा न केवल भारतीय संविधान का मूल उद्देश्य है, बल्कि यह अंतरराष्ट्रीय स्तर पर स्वीकृत सार्वभौमिक सिद्धांत भी है।

ये टिप्पणियां उस समय की गईं, जब हाइकोर्ट ने एक ऐसे आरोपी की जमानत अर्जी स्वीकार की, जिसे पुलिस एनकाउंटर में गंभीर चोटें आई थीं।

अदालत ने इस तथ्य पर भी ध्यान दिया कि इस मामले सहित कई अन्य मामलों में किसी भी पुलिसकर्मी को कोई चोट नहीं आई, जिससे हथियारों के प्रयोग की आवश्यकता और उसकी अनुपातिकता पर गंभीर सवाल खड़े होते हैं।

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