बधाई के नाम पर धन वसूली को कानूनी मान्यता नहीं दी जा सकती: इलाहाबाद हाईकोर्ट

Update: 2026-04-28 13:26 GMT

इलाहाबाद हाईकोर्ट ने महत्वपूर्ण टिप्पणी करते हुए कहा कि किन्नर समुदाय द्वारा शुभ अवसरों पर बधाई के नाम पर धन या उपहार लेने की प्रथा को कोई वैधानिक या कानूनी मान्यता प्राप्त नहीं है और अदालत इसे अधिकार के रूप में वैध नहीं ठहरा सकती।

जस्टिस आलोक माथुर और जस्टिस अमिताभ कुमार राय की खंडपीठ ने यह टिप्पणी याचिका खारिज करते हुए की, जिसमें किन्नर समुदाय की सदस्य रेखा देवी ने बधाई संग्रह के लिए क्षेत्रीय अधिकार क्षेत्र निर्धारित करने की मांग की थी।

याचिकाकर्ता का कहना था कि विभिन्न किन्नर समूह एक-दूसरे के क्षेत्रों में हस्तक्षेप कर रहे हैं, जिससे आपसी विवाद, हिंसा और गंभीर झड़पें हो रही हैं।

उन्होंने दलील दी कि वर्षों से यह प्रथा चली आ रही है, इसलिए यह एक प्रथागत अधिकार बन चुकी है, जिसे अदालत संरक्षण दे।

याचिका में संविधान के अनुच्छेद 14, 19 और 21 के तहत संरक्षण मांगते हुए कहा गया कि उन्हें बिना भय और हिंसा के 'बधाई' संग्रह करने का अधिकार दिया जाए।

हाईकोर्ट ने इस दलील को अस्वीकार करते हुए कहा कि कानून के बिना किसी व्यक्ति को दूसरे से धन, कर, शुल्क या अन्य राशि लेने का अधिकार नहीं दिया जा सकता।

अदालत ने स्पष्ट किया कि कोई भी नागरिक केवल वही राशि देने के लिए बाध्य किया जा सकता है, जिसकी वसूली कानून के अनुसार वैध हो।

अदालत ने कहा,

“कानून की मान्यता के बिना किसी भी व्यक्ति से धन की वसूली, चाहे स्वेच्छा से हो या अन्यथा, स्वीकार नहीं की जा सकती।”

खंडपीठ ने यह भी कहा कि यदि ऐसे दावे को मान्यता दी जाती है तो इससे अन्य व्यक्ति या गिरोह भी अवैध वसूली को परंपरा बताकर संरक्षण मांगने लगेंगे, जो कानून व्यवस्था के लिए गंभीर परिणाम उत्पन्न करेगा।

हाईकोर्ट ने यह भी उल्लेख किया कि ट्रांसजेंडर व्यक्तियों के अधिकार संरक्षण अधिनियम, 2019 में भी ऐसा कोई अधिकार संरक्षित नहीं किया गया।

इन्हीं टिप्पणियों के साथ अदालत ने याचिका खारिज की।

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