नोएडा मजदूर प्रदर्शन: स्टूडेंट एक्टिविस्ट आकृति चौधरी की रासुका हिरासत रद्द, हाईकोर्ट ने राज्य की कहानी को बताया 'गढ़ी हुई'
नोएडा में अप्रैल 2026 में हुए मजदूर प्रदर्शन से जुड़े मामले में इलाहाबाद हाईकोर्ट ने 25 वर्षीय छात्र कार्यकर्ता आकृति चौधरी की राष्ट्रीय सुरक्षा कानून (रासुका) के तहत हिरासत बुधवार को रद्द की।
जस्टिस अतुल श्रीधरन और जस्टिस अचल सचदेव की पीठ ने बंदी प्रत्यक्षीकरण याचिका मंजूर करते हुए कहा कि आकृति की हिरासत राज्य की ओर से पेश की गई एक 'गढ़ी हुई कहानी' पर आधारित थी। अदालत ने निर्देश दिया कि यदि किसी अन्य मामले में उनकी गिरफ्तारी जरूरी न हो तो उन्हें तत्काल रिहा किया जाए।
पीठ ने आकृति की गिरफ्तारी और भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता (BNSS) के तहत जारी नोटिसों के क्रम की बारीकी से जांच की। अदालत को इस प्रक्रिया में कई खामियां मिलीं। मामले में हाईकोर्ट के विस्तृत आदेश की प्रति अभी उपलब्ध नहीं हुई।
बुधवार की सुनवाई के दौरान राज्य सरकार की ओर से अदालत को बताया गया कि आकृति को 12 अप्रैल 2026 को सुबह 10 बजकर 56 मिनट पर गिरफ्तार किया गया। राज्य का कहना था कि उन्हें BNSS की धारा 130 के तहत नोटिस भी दिया गया था। पुलिस का आरोप है कि आकृति ने भीड़ को आगजनी और पथराव के लिए उकसाया था।
इस पर जस्टिस श्रीधरन ने सवाल किया कि क्या इससे पहले आकृति को धारा 126 के तहत नोटिस दिया गया। राज्य की ओर से जवाब दिया गया कि धारा 126 के तहत कोई नोटिस नहीं दिया गया और सीधे धारा 130 के तहत नोटिस जारी किया गया।
खंडपीठ ने BNSS में निर्धारित प्रक्रिया के क्रम को देखते हुए कहा कि धारा 130 की प्रक्रिया से पहले धारा 126 के तहत कार्रवाई का चरण आता है। इसके बाद अदालत ने सामान्य डायरी में दर्ज प्रविष्टि को भी देखा और राज्य के उस दावे पर सवाल उठाया कि पहले नोटिस दिया गया और उसके बाद गिरफ्तारी हुई।
अदालत ने टिप्पणी की,
“यानी उसे पहले गिरफ्तार कर लिया गया और फिर नोटिस बनाया गया।”
खंडपीठ ने यह भी कहा कि रिकॉर्ड से ऐसा प्रतीत होता है कि आकृति को मजिस्ट्रेट के सामने पेश किए जाने से पहले ही गिरफ्तार किया जा चुका था। अदालत ने सवाल किया कि अगर नोटिस पहले दिया गया होता तो सामान्य डायरी में गिरफ्तारी की इस तरह की प्रविष्टि कैसे आती।
अदालत ने आकृति पर हिंसा भड़काने के आरोपों को लेकर राज्य के दावों की भी जांच की। राज्य ने कहा कि मजदूर प्रदर्शन के लिए लोग 11 अप्रैल को जमा हुए।
इस पर जस्टिस श्रीधरन ने सवाल किया कि यदि 11 अप्रैल को कोई हिंसा नहीं हुई थी तो आकृति की कथित भूमिका किस घटना में थी।
अदालत ने टिप्पणी की,
“यानी 11 को कोई हिंसा नहीं थी। जो भी हिंसा हुई, वह उसकी गिरफ्तारी के बाद हुई।”
खंडपीठ इस बात की जांच कर रही थी कि राज्य की ओर से पेश सामग्री वास्तव में आकृति को हिंसा भड़काने से जोड़ती है या नहीं।
इससे एक दिन पहले मंगलवार को भी अदालत ने राज्य से ऐसे वीडियो फुटेज पेश करने को कहा था, जिनसे यह साबित हो सके कि आकृति ने प्रदर्शनकारियों को पथराव करने या वाहनों में आग लगाने के लिए उकसाया। राज्य ने वीडियो पेश करने के लिए समय मांगा, लेकिन अदालत ने और समय देने से इनकार किया। खंडपीठ ने कहा कि आकृति पहले ही करीब पांच महीने जेल में बिता चुकी हैं।
मंगलवार की सुनवाई में अदालत ने राज्य से यह भी पूछा था कि रिकॉर्ड में कहां दर्ज है कि आकृति ने लोगों को बुलाकर पथराव करने के लिए कहा था। अदालत ने यह भी पूछा था कि क्या कोई ऐसा साक्ष्य मौजूद है, जिसमें उन्होंने प्रदर्शनकारियों से वाहनों में आग लगाने के लिए कहा हो।
जब राज्य की ओर से बताया गया कि मामले में आरोपपत्र दाखिल हो चुका है तो जस्टिस श्रीधरन ने कहा था कि आरोपपत्र दाखिल होने के बाद यह देखा जाना चाहिए कि गवाहों ने आकृति का नाम किस आधार पर लिया है।
इसके बाद राज्य ने उन गवाहों के बयानों का हवाला दिया, जिनमें आकृति का नाम होने की बात कही गई। हालांकि, खंडपीठ ने फिर सवाल किया कि वीडियो में ऐसा क्या दिखाई देता है, जिससे यह साबित हो कि उन्होंने प्रदर्शनकारियों को कथित हिंसा के लिए उकसाया था।
आकृति चौधरी दिल्ली विश्वविद्यालय से इतिहास की स्नातक हैं और नोएडा मजदूर प्रदर्शन से जुड़े मामलों में गिरफ्तार किए गए कई कार्यकर्ताओं में शामिल थीं। उत्तर प्रदेश पुलिस ने बाद में 13 मई को उनके खिलाफ राष्ट्रीय सुरक्षा कानून के तहत कार्रवाई की थी। कार्यकर्ता और पत्रकार सत्यम वर्मा पर भी इसी कानून के तहत कार्रवाई की गई।
उस समय गौतम बुद्ध नगर पुलिस की पुलिस आयुक्त लक्ष्मी सिंह ने दावा किया कि पुलिस के पास आकृति चौधरी, सत्यम वर्मा और अन्य गिरफ्तार लोगों के खिलाफ मजबूत इलेक्ट्रॉनिक और वीडियो साक्ष्य मौजूद हैं।
इसके बाद आकृति ने अपनी हिरासत को चुनौती देते हुए इलाहाबाद हाईकोर्ट में बंदी प्रत्यक्षीकरण याचिका दाखिल की थी। बुधवार को अदालत ने उनकी याचिका स्वीकार करते हुए रासुका के तहत हिरासत रद्द की और अन्य किसी मामले में गिरफ्तारी जरूरी नहीं होने की स्थिति में उनकी तत्काल रिहाई का आदेश दिया।
हाईकोर्ट के विस्तृत आदेश से यह स्पष्ट होगा कि अदालत ने हिरासत रद्द करने के लिए किन कानूनी और तथ्यात्मक आधारों को निर्णायक माना है।