रेप में मदद के लिए पहरा देना IPC की धारा 34 के तहत 'साझा इरादे' की जवाबदेही बनाता है: इलाहाबाद हाईकोर्ट ने 1984 के मामले में सज़ा बरकरार रखी

Update: 2026-07-30 04:23 GMT

इलाहाबाद हाईकोर्ट ने बुधवार को 1984 के गैंग-रेप मामले में 2 लोगों की सज़ा बरकरार रखr। कोर्ट ने कहा कि जो व्यक्ति रेप में मदद करने के लिए पहरा देता है, वह भी अपराध के पीछे के 'साझा इरादे' में शामिल माना जाता है। उसे IPC की धारा 34 की मदद से रेप का दोषी ठहराया जा सकता है, भले ही उसने खुद रेप (पेनिट्रेशन) न किया हो।

जस्टिस संतोष राय की बेंच ने 1985 के ट्रायल कोर्ट के उस फ़ैसले के ख़िलाफ़ दायर आपराधिक अपील खारिज की, जिसमें जीवित अपीलकर्ताओं को IPC की धारा 376 और धारा 34 के तहत दोषी ठहराया गया।

कोर्ट ने ट्रायल कोर्ट के इस निष्कर्ष से सहमति जताई कि मुख्य आरोपी ने रेप किया था, जबकि अपीलकर्ता-सुभाष सिंह (आरोपी नंबर 1) ने एक पीड़िता को पकड़ा और अपराध में मदद करने के लिए उसका मुँह और हाथ दबाए रखे।

कोर्ट ने इस निष्कर्ष को भी बरकरार रखा कि अपीलकर्ता-शेर सिंह (आरोपी नंबर 2) ने दूसरी पीड़िता को काबू करने में मदद की। उसके बाद किसी भी ख़तरे के बारे में दूसरे आरोपियों को आगाह करने के लिए पहरा दिया, जिससे रेप को अंजाम देना मुमकिन हो सका।

मामले का संक्षिप्त विवरण

अभियोजन पक्ष के अनुसार, 14 मार्च 1984 को दो महिलाएँ गाँव के बाग में सूखी पत्तियां इकट्ठा करने गई थीं। वहां 5 आरोपियों ने उन्हें घेर लिया, काबू में किया और एक गड्ढे में फेंक दिया।

इसके बाद 2 आरोपियों ने रेप किया, जबकि बाकी आरोपियों (जिनमें हाई कोर्ट के सामने मौजूद 2 जीवित अपीलकर्ता भी शामिल हैं) ने पीड़ितों को रोके रखा और तब तक पहरा देते रहे, जब तक कि पीड़ितों की चीखें सुनकर और एक रिश्तेदार को आते देखकर वे भाग नहीं गए।

अपील लंबित रहने के दौरान, तीन अपीलकर्ताओं में से एक शांति की मौत हो गई और उसके मामले में अपील समाप्त (Abated) हो गई। नतीजतन, अपील केवल अपीलकर्ता-सुभाष सिंह और शेर सिंह के मामले में ही जारी रही।

अन्य बातों के अलावा, आरोपी-अपीलकर्ताओं का बचाव करने के लिए नियुक्त एमिक्स क्यूरी (न्याय मित्र) ने तर्क दिया कि अपीलकर्ताओं पर रेप से जुड़ा कोई विशिष्ट प्रत्यक्ष कार्य (Overt Act) करने का आरोप नहीं था; उन पर ज़्यादा से ज़्यादा यही आरोप था कि उन्होंने मुख्य आरोपी द्वारा अपराध को अंजाम देने में मदद की थी। खास तौर पर यह तर्क दिया गया कि अपीलकर्ता शेर सिंह को कोई स्वतंत्र भूमिका नहीं सौंपी गई; उस पर केवल "पहरा देने" का आरोप था। एमिकस (न्यायालय मित्र) के अनुसार, अकेले इस आधार पर IPC की धारा 34 की मदद से दोषसिद्धि (Conviction) को कायम नहीं रखा जा सकता।

हाईकोर्ट की टिप्पणियां

अपीलकर्ता शेर सिंह की भूमिका के बारे में दिए गए तर्क को खारिज करते हुए हाईकोर्ट ने IPC की धारा 34 के तहत 'कंस्ट्रक्टिव लायबिलिटी' (संयुक्त या परोक्ष दायित्व) के दायरे को विस्तार से समझाया।

कोर्ट ने कहा कि धारा 34 संयुक्त या परोक्ष दायित्व के सिद्धांत को समाहित करती है और यह "कोई मूल अपराध नहीं है, बल्कि सबूत और व्याख्या का एक नियम है"।

कोर्ट ने कहा कि एक बार जब 'साझा इरादा' (Common Intention) और 'भागीदारी' साबित हो जाती है तो अंतिम परिणाम तक पहुंचने में प्रत्येक आरोपी द्वारा निभाई गई सटीक भूमिका का निर्धारण करना आवश्यक नहीं रह जाता।

कोर्ट ने आगे कहा कि भागीदारी "सक्रिय या निष्क्रिय भी हो सकती है, बशर्ते उसका उद्देश्य साझा योजना को सुविधाजनक बनाना या उसे आगे बढ़ाना हो"।

कोर्ट ने यह भी कहा कि साझा इरादा घटना स्थल पर भी बन सकता है और इसका अनुमान आरोपी के आचरण, हमले की प्रकृति, घटना से पहले, उसके दौरान और बाद में उनके व्यवहार तथा आसपास की परिस्थितियों से लगाया जाना चाहिए।

साथ ही कोर्ट ने स्पष्ट किया कि अपराध करने के साझा इरादे या भागीदारी के बिना, केवल घटना स्थल पर मौजूद होना IPC की धारा 34 को लागू करने के लिए पर्याप्त नहीं है।

इस पृष्ठभूमि में कोर्ट ने पाया कि सबूतों से यह साबित हुआ कि अपीलकर्ताओं ने पीड़ितों को रोककर और मुख्य अपराधियों को अपराध करने में सक्षम बनाकर बलात्कार की घटना को सक्रिय रूप से सुविधाजनक बनाया।

अपीलकर्ताओं की भूमिकाओं की जांच करते हुए जस्टिस राय ने टिप्पणी की:

"ऐसा आचरण किसी निष्क्रिय दर्शक का नहीं है, बल्कि यह दो लड़कियों पर काबू पाने और उनके बलात्कार को सुविधाजनक बनाने की एक साझा, पहले से तय योजना को दर्शाता है, जो सीधे तौर पर IPC की धारा 34 को आकर्षित करता है"।

शेर सिंह को दोषी नहीं ठहराया जा सकता, क्योंकि उसने खुद 'पेनिट्रेशन' (यौन प्रवेश) नहीं किया था - इस तर्क को खारिज करते हुए कोर्ट ने टिप्पणी की:

"जो व्यक्ति अपने साथियों को अपराध करने में मदद करने के लिए पहरा देता है, वह भी 'साझा इरादे' (Common Intention) में मुख्य अपराधी के बराबर ही शामिल माना जाता है। यह इस परखे हुए सिद्धांत पर आधारित है कि 'वे भी सेवा करते हैं जो केवल खड़े होकर प्रतीक्षा करते हैं'।"

अदालत ने आगे दोहराया कि जहां साझा इरादा साबित हो जाता है, वहां हर आरोपी का 'पेनिट्रेशन' (Penetration) का कृत्य करना ज़रूरी नहीं है, बशर्ते सबूत यह दिखाएं कि उन्होंने साझा योजना को आगे बढ़ाने में भाग लिया था।

बेंच ने सुप्रीम कोर्ट के 2025 के 'राजू उर्फ ​​उमाकांत बनाम मध्य प्रदेश राज्य' मामले के फैसले का भी हवाला दिया। इस फैसले में दोहराया गया कि गैंग रेप के मामले में अगर साझा इरादे को आगे बढ़ाते हुए एक भी आरोपी रेप करता है तो इसमें शामिल हर व्यक्ति दोषी माना जाएगा, चाहे उसने खुद पेनिट्रेशन किया हो या नहीं।

हाईकोर्ट ने मेडिकल सबूतों के आधार पर 'एमिक्स क्ूरी' की उस दलील को भी खारिज कर दिया, जिसमें कहा गया कि एक पीड़िता का हाइमन (Hymen) सुरक्षित पाया गया।

स्थापित कानून का हवाला देते हुए अदालत ने कहा कि रेप के अपराध के लिए ज़रूरी यौन संबंध साबित करने के लिए पेनिट्रेशन (चाहे वह कितना भी कम क्यों न हो) काफी है, और अपराध साबित करने के लिए हाइमन का फटना अनिवार्य शर्त नहीं है।

इसके अनुसार, ट्रायल कोर्ट द्वारा सबूतों के मूल्यांकन में कोई कमी न पाते हुए हाईकोर्ट ने जीवित अपीलकर्ताओं की दोषसिद्धि (Conviction) को बरकरार रखा और उन्हें अपनी बाकी सजा काटने के लिए 2 सप्ताह के भीतर सरेंडर करने का निर्देश दिया।

हालाँकि, अदालत ने यह भी पाया कि ट्रायल कोर्ट ने कानूनी गलती की थी। उसने पर्याप्त और विशेष कारण दर्ज किए बिना कानून द्वारा तय न्यूनतम सजा से कम सजा सुनाई और कानून द्वारा अनिवार्य जुर्माना भी नहीं लगाया।

हालांकि, अदालत ने यह भी कहा कि वह केवल दोषी आरोपी द्वारा दायर अपील में सजा नहीं बढ़ा सकती, क्योंकि न तो राज्य और न ही पीड़ितों ने सजा बढ़ाने की मांग की थी।

Case Title - Subhash Singh and others vs State 2026 LiveLaw (AB) 490

Tags:    

Similar News