लिव-इन साथी, उसकी मां और दो मासूम बच्चों की हत्या के दोषी की उम्रकैद बरकरार: इलाहाबाद हाईकोर्ट ने खारिज की अपील
इलाहाबाद हाईकोर्ट ने वर्ष 2009 में हरदोई में अपनी लिव-इन साथी, उसकी मां और दो नाबालिग बच्चों की गला घोंटकर हत्या करने के मामले में दोषी विनय प्रताप सिंह उर्फ बबलू की उम्रकैद की सजा बरकरार रखी। कोर्ट ने कहा कि अभियोजन पक्ष ने परिस्थितिजन्य साक्ष्यों की पूरी श्रृंखला स्थापित कर दी है और आरोपी का अपराध संदेह से परे साबित होता है।
जस्टिस राजेश सिंह चौहान और जस्टिस अब्देश कुमार चौधरी की खंडपीठ ने आरोपी की आपराधिक अपील खारिज करते हुए वर्ष 2014 में हरदोई की निचली अदालत द्वारा सुनाए गए फैसले को सही ठहराया। निचली अदालत ने आरोपी को भारतीय दंड संहिता (IPC) की धारा 302, 307, 404 तथा अनुसूचित जाति एवं अनुसूचित जनजाति (अत्याचार निवारण) अधिनियम (SC/ST Act) की धारा 3(2)(5) के तहत दोषी ठहराते हुए उम्रकैद की सजा सुनाई।
मामले के अनुसार मृतका बबीता आंगनबाड़ी कार्यकर्ता थी। पति की मृत्यु के बाद वह अपने दो बच्चों के साथ अपनी मां नंदरानी के घर रहने लगी थी। अभियोजन के अनुसार, घटना से करीब डेढ़ वर्ष पहले से विनय प्रताप सिंह बबीता के साथ लिव-इन संबंध में उसी घर में रह रहा था।
23 और 24 जून 2009 की रात दोनों के बीच विवाद हुआ था। अगली सुबह बबीता, उसकी मां और दोनों बच्चों के शव घर के भीतर मिले। चारों के गले में कपड़े का फंदा बंधा हुआ था। पोस्टमार्टम रिपोर्ट में चारों की मौत गला घोंटने से होना पाया गया।
आरोपी ने हाईकोर्ट में दलील दी कि पूरा मामला केवल परिस्थितिजन्य साक्ष्यों पर आधारित है और किसी प्रत्यक्षदर्शी ने उसे हत्या करते नहीं देखा। उसने यह भी कहा कि 'आखिरी बार साथ देखे जाने' का सिद्धांत भरोसेमंद नहीं है, बरामदगी संदिग्ध है और संपत्ति विवाद के कारण उसे झूठा फंसाया गया।
हाईकोर्ट ने इन सभी दलीलों को खारिज किया। कोर्ट ने कहा कि शिकायतकर्ता, मृतका की बहन और एक स्वतंत्र पड़ोसी की गवाही से यह स्पष्ट साबित होता है कि आरोपी करीब डेढ़ वर्ष से मृतका के साथ उसी घर में रह रहा था।
कोर्ट ने यह भी नोट किया कि पड़ोसी ने घटना से एक रात पहले आरोपी और बबीता के बीच गंभीर झगड़ा होते देखा और उसके बाद आरोपी को घर से बाहर जाते नहीं देखा। वहीं, आरोपी ने भी अपने बयान में स्वीकार किया कि उसका बबीता के साथ घनिष्ठ संबंध था और वह कई बार उसके घर पर ठहर चुका था।
कोर्ट ने माना कि अभियोजन पक्ष हत्या का मकसद साबित करने में भी सफल रहा। रिकॉर्ड के अनुसार, आरोपी बबीता पर अदालत में विवाह करने का दबाव बना रहा था, जबकि बबीता इसके लिए तैयार नहीं थी। वह यह भी शिकायत करती थी कि आरोपी बेरोजगार था और उसकी कमाई पर निर्भर रहता था, जिससे दोनों के बीच अक्सर विवाद होता था।
हाईकोर्ट ने यह भी माना कि घटना के तुरंत बाद मृतका के गहने, मोबाइल फोन और अन्य सामान आरोपी की निशानदेही पर बरामद किए गए, जो अभियोजन के पक्ष को मजबूत करते हैं। मेडिकल साक्ष्य और घटना के बाद आरोपी का व्यवहार भी उसके खिलाफ महत्वपूर्ण परिस्थितियां साबित हुईं।
कोर्ट ने कहा कि यदि चार लोगों की हत्या हो गई और आरोपी स्वयं स्वीकार कर चुका था कि उसका मृतका के साथ घनिष्ठ संबंध था तथा वह उससे विवाह करना चाहता था, तो उसे सबसे पहले पुलिस के पास जाना चाहिए था। इसके बजाय उसने न तो घटना की सूचना दी और न ही पंचनामा की कार्यवाही में शामिल हुआ। कोर्ट ने कहा कि घटना के बाद आरोपी का यह आचरण भी उसके खिलाफ एक महत्वपूर्ण परिस्थिति है।
हाईकोर्ट ने भारतीय साक्ष्य अधिनियम की धारा 106 का हवाला देते हुए कहा कि जब अभियोजन पक्ष प्रारंभिक तथ्य स्थापित करने में सफल हो गया, तब आरोपी पर यह दायित्व था कि वह उन तथ्यों का संतोषजनक स्पष्टीकरण दे, जो विशेष रूप से उसकी जानकारी में थे। लेकिन वह ऐसा करने में पूरी तरह विफल रहा।
कोर्ट ने कहा,
"अभियोजन पक्ष आरोपी का अपराध संदेह से परे साबित करने में सफल रहा है और उसके पूरे घटनाक्रम में सत्यता स्पष्ट दिखाई देती है।"
इन सभी तथ्यों को देखते हुए हाईकोर्ट ने कहा कि निचली अदालत ने मौखिक, दस्तावेजी और मेडिकल साक्ष्यों का सही मूल्यांकन किया है। दोषसिद्धि और सजा में कोई कानूनी त्रुटि नहीं है। इसलिए आरोपी की अपील खारिज करते हुए उसकी उम्रकैद की सजा बरकरार रखी जाती है।