इलाहाबाद हाईकोर्ट ने कहा कि भारतीय दंड संहिता (IPC) की धारा 396 (हत्या के साथ डकैती) के तहत दोषी ठहराने के लिए अभियोजन पक्ष को यह साबित करना होगा कि डकैती ही मुख्य इरादा था और हत्या डकैती करने के दौरान ही की गई।

जस्टिस समित गोपाल की बेंच ने 1981 के मामले में आपराधिक अपील को मंज़ूरी देते हुए और जीवित बचे आरोपी को बरी करते हुए यह टिप्पणी की। कोर्ट ने पाया कि अभियोजन पक्ष कथित डकैती और हत्या के बीच ज़रूरी संबंध साबित करने में नाकाम रहा।

मामले का संक्षिप्त विवरण

यह मामला 30 दिसंबर 1981 की एक घटना से जुड़ा है, जब चेहका गाँव के सामने एक पुलिया के पास अतर सिंह की हत्या कर दी गई।

अभियोजन पक्ष के अनुसार, मृतक अतर सिंह बस से उतरने के बाद अपने बेटे, भाई और अन्य लोगों के साथ जा रहे थे, तभी उनका सामना आरोपी महावीर और लगभग 12 हथियारबंद लोगों से हुआ।

अभियोजन पक्ष का आरोप है कि महावीर की मृतक अतर सिंह से पुरानी दुश्मनी थी। कथित तौर पर आरोपी महावीर ने उन्हें चुनौती दी और तुरंत उन पर गोली चला दी। अतर सिंह, जिनके पास अपनी लाइसेंसी SBBL बंदूक थी, ने कथित तौर पर जवाबी फायरिंग की, जिससे महावीर के समूह के दो लोग घायल हो गए।

इसके बाद कथित तौर पर महावीर की तरफ से और फायरिंग हुई, जिससे अतर सिंह को गोली लगी। वे सड़क किनारे गिर पड़े और बाद में उनकी मौत हो गई।

अभियोजन पक्ष ने यह भी आरोप लगाया कि फायरिंग के बाद आरोपियों में से एक चंद्रपाल, अतर सिंह की बंदूक और कारतूस बेल्ट ले गया।

शुरुआत में FIR में छह नामजद आरोपियों और 12 अज्ञात हथियारबंद लोगों के खिलाफ IPC की धारा 147, 148, 149, 302 और 404 लगाई गईं। हालांकि, ट्रायल कोर्ट ने आखिरकार आरोपियों को IPC की धारा 396 के तहत दोषी ठहराया और उन्हें 10 साल की कठोर कैद की सज़ा सुनाई।

अपील लंबित रहने के दौरान, कृष्ण पाल, राम लाल, मुंशी सिंह और चंद्रपाल की मौत हो गई और उनके मामले में अपीलें खत्म हो गईं। इसके बाद अपील सिर्फ़ सत्तू के मामले में ही बची, जिसकी सज़ा की समीक्षा हाईकोर्ट ने की।

हाईकोर्ट की टिप्पणियां

हाईकोर्ट ने इस बात की जांच की कि क्या अभियोजन पक्ष के सबूत IPC की धारा 396 की शर्तों को पूरा करते हैं या नहीं। यह धारा तब लागू होती है जब पाँच या उससे ज़्यादा लोग मिलकर डकैती करते हैं और उस डकैती के दौरान हत्या भी कर देते हैं।

बेंच ने IPC की धारा 391 का भी ज़िक्र किया, जिसके तहत पाँच या उससे ज़्यादा लोग मिलकर लूट करते हैं या लूट करने की कोशिश करते हैं, तो उसे डकैती माना जाता है।

कोर्ट ने पाया कि अभियोजन पक्ष का अपना ही बयान यह साबित नहीं करता कि आरोपी डकैती करने के इरादे से घटनास्थल पर गए।

इसके बजाय, अभियोजन पक्ष के अनुसार, दोनों पक्ष अचानक मिले थे और महावीर ने अतर सिंह को उनकी पुरानी दुश्मनी के कारण चुनौती दी थी। दोनों तरफ़ से गोलीबारी हुई, जिसमें अतर सिंह की मौत हो गई।

अभियोजन पक्ष का आरोप था कि गोलीबारी और मौत के बाद ही चंद्रपाल ने अतर सिंह की बंदूक और कारतूस की बेल्ट ले ली थी।

इन हालात पर ध्यान देते हुए बेंच ने टिप्पणी की:

"इस तरह अभियोजन पक्ष की कहानी से पता चलता है कि शिकायतकर्ता और महावीर व उसके साथियों का आमना-सामना अचानक हुआ। इसलिए अभियोजन पक्ष के मामले के अनुसार आरोपियों का इरादा डकैती के साथ हत्या करने का नहीं कहा जा सकता... मौजूदा मामले में डकैती करने और उस दौरान हत्या करने के काम के बीच कोई संबंध साबित नहीं होता है।"

हाईकोर्ट ने कहा कि अभियोजन पक्ष की कहानी IPC की धारा 396 के तहत डकैती के साथ हत्या की सज़ा के साथ "किसी भी तरह से" मेल नहीं खाती है।

कोर्ट ने बताया कि धारा 396 में पाँच या उससे ज़्यादा लोगों द्वारा मिलकर डकैती करने को पहला काम माना जाता है। उसके बाद उस डकैती के दौरान हत्या की जाती है। हालांकि, मौजूदा मामले में अभियोजन पक्ष ऐसा क्रम साबित करने में नाकाम रहा।

कोर्ट ने इस प्रकार टिप्पणी की:

"अभियोजन पक्ष के बयान के अनुसार, शिकायतकर्ता पक्ष और आरोपी पक्ष अचानक मिले थे और अतर सिंह व महावीर के बीच दुश्मनी के कारण उन्हें चुनौती दी गई। रिकॉर्ड पर ऐसा कोई सबूत नहीं है, जिससे यह पता चले कि महावीर का डकैतों का कोई गिरोह था, जिसमें जीवित अपीलकर्ता भी शामिल था।"

इसलिए कोर्ट ने यह निष्कर्ष निकाला कि अभियोजन पक्ष यह साबित करने में विफल रहा कि डकैती का इरादा प्राथमिक था और डकैती के दौरान हत्या की गई।

कोर्ट ने इस बात को भी महत्वपूर्ण माना कि कई लोगों द्वारा कथित गोलीबारी के बावजूद, शिकायतकर्ता पक्ष का कोई अन्य व्यक्ति घायल नहीं हुआ। यह भी ध्यान दिया गया कि जीवित अपीलकर्ता-सत्तू के पास से या उसकी निशानदेही पर कोई भी आपत्तिजनक सामग्री बरामद नहीं हुई।

इसके अनुसार, हाईकोर्ट ने उसकी अपील स्वीकार की और एटा के एडिशनल जिला एवं सेशन जज (स्पेशल कोर्ट) द्वारा 2 नवंबर, 1982 को सुनाए गए फैसले को रद्द कर दिया। कोर्ट ने उसे आरोपों से बरी कर दिया।

Case Title - Krishna Pal and others vs State 2026 LiveLaw (AB) 635

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