हर प्रक्रियागत त्रुटि से मध्यस्थता निर्णय रद्द नहीं होता: इलाहाबाद हाईकोर्ट
इलाहाबाद हाईकोर्ट की लखनऊ पीठ ने महत्वपूर्ण टिप्पणी करते हुए कहा कि हर प्रक्रियागत अनियमितता मध्यस्थता के निर्णय को स्वतः अवैध नहीं बनाती और न ही केवल इसी आधार पर मध्यस्थता एवं सुलह अधिनियम, 1996 की धारा 34 या 37 के तहत अदालत हस्तक्षेप कर सकती है।
चीफ जस्टिस अरुण भंसाली और जस्टिस जसप्रीत सिंह की खंडपीठ ने यह फैसला उत्तर प्रदेश राज्य राजमार्ग प्राधिकरण और मेरठ-कर्नाल सड़क परियोजना के रियायतधारी के बीच हुए विवाद में सुनाया।
खंडपीठ ने कहा,
"हर प्रक्रियागत अनियमितता का प्रभाव मध्यस्थता निर्णय को निरस्त करने वाला नहीं होता और न ही वह अदालत को धारा 34 या 37 के तहत हस्तक्षेप का अधिकार देती है।"
मामला वर्ष 2011 में मेरठ-कर्नाल सड़क को फोरलेन बनाने की सार्वजनिक-निजी भागीदारी (PPP) परियोजना से जुड़ा था। समझौते के अनुसार परियोजना 730 दिनों में पूरी होनी थी लेकिन प्राधिकरण 90 प्रतिशत भूमि उपलब्ध कराने की अपनी पूर्व शर्त पूरी नहीं कर सका। इसके बाद रियायतधारी कंपनी ने वर्ष 2014 में समझौता समाप्त कर मध्यस्थता का सहारा लिया। इसी दौरान प्राधिकरण ने लगभग 29.16 करोड़ रुपये की प्रदर्शन सुरक्षा राशि भी भुना ली।
मध्यस्थता अधिकरण के बहुमत ने कंपनी को लाभ की हानि के मद में 157.57 करोड़ रुपये तथा ईपीसी ठेकेदारों को किए गए भुगतान के लिए 25.53 करोड़ रुपये देने का आदेश दिया। हालांकि, पीठासीन मध्यस्थ ने अपने अलग मत में इन दावों को अस्वीकार किया था।
बाद में दोनों पक्षों ने कॉमर्शियल कोर्ट के फैसले को हाईकोर्ट में चुनौती दी।
सुनवाई के दौरान उत्तर प्रदेश राज्य राजमार्ग प्राधिकरण ने दलील दी कि अंतिम बहस पूरी होने के बाद कंपनी ने तीन नए दस्तावेज दाखिल किए, जिन्हें अधिकरण ने रिकॉर्ड पर ले लिया। प्राधिकरण का कहना था कि इन दस्तावेजों का जवाब देने का अवसर नहीं दिया गया, जिससे प्राकृतिक न्याय के सिद्धांतों का उल्लंघन हुआ।
हाईकोर्ट ने पाया कि अधिकरण ने दस्तावेजों को रिकॉर्ड पर तो लिया था, लेकिन उनकी ग्राह्यता और प्रासंगिकता का अंतिम निर्णय नहीं दिया। अदालत ने कहा कि यह अधिकतम एक प्रक्रियागत अनियमितता हो सकती है, क्योंकि मध्यस्थता अधिकरण तकनीकी प्रक्रिया से बंधा नहीं होता और अपनी कार्यवाही की प्रक्रिया स्वयं निर्धारित कर सकता है।
अदालत ने यह भी कहा कि प्राधिकरण यह साबित नहीं कर सका कि उसने दस्तावेजों का जवाब देने का अवसर मांगा और उसे उससे वंचित किया गया, या फिर इन दस्तावेजों से उसके मामले को वास्तविक नुकसान पहुंचा।
हाईकोर्ट ने स्पष्ट किया कि यदि कोई प्रक्रियागत अनियमितता अधिकरण के अधिकार क्षेत्र को प्रभावित करती है या प्राकृतिक न्याय के सिद्धांतों का उल्लंघन करते हुए किसी पक्ष को अपना पक्ष प्रभावी ढंग से रखने से वंचित कर देती है, तभी वह मध्यस्थता निर्णय रद्द करने का आधार बन सकती है।
इन्हीं कारणों से हाईकोर्ट ने माना कि इस मामले में ऐसी कोई गंभीर प्रक्रियागत त्रुटि नहीं हुई, जिसके आधार पर मध्यस्थता निर्णय में हस्तक्षेप किया जाए। इसलिए अदालत ने प्राधिकरण की अपील खारिज की।