सिर्फ अदालत के कहने पर अभियोजन स्वीकृति नहीं दी जा सकती: इलाहाबाद हाईकोर्ट ने पूर्व डीएम के खिलाफ CBI मामला किया खत्म

Update: 2026-07-27 09:58 GMT

इलाहाबाद हाईकोर्ट ने महत्वपूर्ण फैसले में कहा कि कोई भी ट्रायल कोर्ट केंद्रीय अन्वेषण ब्यूरो (CBI) जैसी जांच एजेंसी को यह निर्देश नहीं दे सकती कि वह किसी लोक सेवक के खिलाफ अभियोजन स्वीकृति हर हाल में सुनिश्चित करे। अदालत ने कहा कि ऐसा निर्देश वास्तव में सक्षम प्राधिकारी को अभियोजन स्वीकृति देने के लिए निर्देशित करने जैसा है, जिसकी कानून में अनुमति नहीं है।

जस्टिस राज बीर सिंह की सिंगल बेंच ने यह टिप्पणी सहारनपुर के तत्कालीन जिलाधिकारी पवन कुमार की याचिका स्वीकार करते हुए की। अदालत ने विशेष CBI अदालत गाजियाबाद के उस आदेश को रद्द किया, जिसमें CBI की क्लोजर रिपोर्ट स्वीकार करने से इनकार करते हुए एजेंसी को पवन कुमार के खिलाफ अभियोजन स्वीकृति प्राप्त करने का निर्देश दिया गया।

हाईकोर्ट ने पवन कुमार के संबंध में CBI की क्लोजर रिपोर्ट स्वीकार करते हुए उनके खिलाफ चल रही कार्यवाही भी समाप्त की। वर्तमान में पवन कुमार दिल्ली के ग्रामीण विकास विभाग में निदेशक के पद पर कार्यरत हैं।

मामला सहारनपुर में रेत खनन की 13 पट्टों के कथित अवैध नवीनीकरण से जुड़ा है। प्रारंभिक जांच के बाद इस संबंध में FIR दर्ज की गई। जांच पूरी होने पर CBI ने अपनी क्लोजर रिपोर्ट में कहा कि पवन कुमार के खिलाफ आरोपों की पुष्टि नहीं हुई और उनके विरुद्ध आपराधिक साजिश, धोखाधड़ी या पद के दुरुपयोग का कोई साक्ष्य नहीं मिला।

इसके बावजूद विशेष CBI अदालत ने क्लोजर रिपोर्ट स्वीकार नहीं की। अदालत ने निजी आरोपियों के खिलाफ संज्ञान लेते हुए CBI को पवन कुमार के खिलाफ भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम के तहत अभियोजन स्वीकृति प्राप्त करने का निर्देश दिया।

इस आदेश को चुनौती देते हुए पवन कुमार ने हाईकोर्ट में कहा कि उन्होंने केवल अपने आधिकारिक दायित्वों का निर्वहन किया। राज्य सरकार के निर्देश पर उन्होंने अधीनस्थ अधिकारियों से तथ्यात्मक रिपोर्ट मंगाई और उसे बिना किसी टिप्पणी या सिफारिश के सरकार को भेज दिया। उनका कहना था कि खनन पट्टों के नवीनीकरण का अंतिम निर्णय राज्य सरकार को लेना था और उन्होंने इस संबंध में कोई स्वतंत्र राय या सिफारिश नहीं दी।

CBI ने दलील दी कि याचिका सुनवाई योग्य नहीं है, क्योंकि अभी तक पवन कुमार को समन जारी नहीं किया गया और ट्रायल कोर्ट ने केवल अभियोजन स्वीकृति प्राप्त करने का निर्देश दिया।

हालांकि, हाईकोर्ट ने इस आपत्ति को खारिज किया। अदालत ने कहा कि ट्रायल कोर्ट पहले ही यह राय दे चुकी है कि प्रथम दृष्टया मामला बनता है और अभियोजन स्वीकृति प्राप्त करने का निर्देश दिया गया। ऐसे में यह आदेश याचिकाकर्ता के अधिकारों को प्रभावित करता है, इसलिए याचिका सुनवाई योग्य है।

अभियोजन स्वीकृति के मुद्दे पर हाईकोर्ट ने सुप्रीम कोर्ट के पूर्व फैसलों का हवाला देते हुए कहा कि अभियोजन स्वीकृति देने या न देने का अधिकार केवल सक्षम प्राधिकारी के पास है और उसे जांच में जुटाए गए साक्ष्यों पर स्वतंत्र रूप से विचार करना होता है।

अदालत ने स्पष्ट शब्दों में कहा,

"न तो कोई अदालत और न ही कोई अन्य प्राधिकारी सक्षम प्राधिकारी को अभियोजन स्वीकृति देने या न देने का निर्देश दे सकता है।"

हाईकोर्ट ने माना कि विशेष अदालत का CBI को दिया गया निर्देश वास्तव में सक्षम प्राधिकारी को ही अभियोजन स्वीकृति देने के लिए बाध्य करने जैसा था, जो कानून के अनुरूप नहीं है।

मामले के गुण-दोष पर विचार करते हुए हाईकोर्ट ने पाया कि CBI जांच में ऐसा कोई साक्ष्य नहीं मिला, जिससे यह साबित हो कि पवन कुमार ने कोई गलत रिपोर्ट भेजी, किसी प्रकार की सिफारिश की या खनन पट्टों के नवीनीकरण में अनुचित भूमिका निभाई।

अदालत ने यह भी कहा कि राज्य सरकार द्वारा दूसरे नवीनीकरण को मंजूरी मिलने के बाद पवन कुमार ने केवल सरकार के निर्णय को अधीनस्थ अधिकारियों तक पहुंचाने का औपचारिक आदेश जारी किया। लेकिन इससे पहले कि कोई नया पट्टा निष्पादित होता, एक जनहित याचिका में हाईकोर्ट ने दूसरे नवीनीकरण पर रोक लगाई। इसलिए दूसरा पट्टा कभी निष्पादित ही नहीं हुआ। अदालत ने कहा कि ट्रायल कोर्ट का इसके विपरीत किया गया अवलोकन तथ्यात्मक रूप से गलत था।

हाईकोर्ट ने कहा कि जांच में ऐसा कोई साक्ष्य नहीं मिला, जिससे यह माना जा सके कि पवन कुमार ने अपने पद का दुरुपयोग किया या किसी आपराधिक साजिश में शामिल थे।

अदालत ने कहा,

"रिकॉर्ड पर ऐसा कोई साक्ष्य नहीं है, जिससे याचिकाकर्ता की किसी आपराधिक साजिश में भूमिका या भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम के तहत किसी प्रकार के कदाचार का संकेत मिलता हो।"

इन सभी तथ्यों को देखते हुए हाईकोर्ट ने माना कि पवन कुमार के खिलाफ प्रथम दृष्टया कोई मामला नहीं बनता। अदालत ने उनके संबंध में CBI की क्लोजर रिपोर्ट स्वीकार करते हुए विशेष अदालत की कार्यवाही रद्द की और याचिका मंजूर की।

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