देरी से दायर POSH शिकायतें केवल विलंब के आधार पर खारिज नहीं की जा सकतीं: इलाहाबाद हाईकोर्ट
इलाहाबाद हाईकोर्ट ने स्पष्ट किया कि कार्यस्थल पर महिलाओं के यौन उत्पीड़न से संरक्षण (POSH) कानून के तहत दायर शिकायतों को केवल देरी के आधार पर प्रारंभिक स्तर पर खारिज नहीं किया जा सकता। शिकायत में हुई देरी के कारणों पर विचार करना आंतरिक शिकायत समिति (ICC) का दायित्व है।
जस्टिस सौरभ श्याम शमशेरी ने यह टिप्पणी करते हुए प्रयागराज स्थित हरिशचंद्र अनुसंधान संस्थान के खगोल भौतिकी विभाग के एसोसिएट प्रोफेसर के खिलाफ दायर यौन उत्पीड़न की शिकायतों की दोबारा जांच का निर्देश दिया।
मामला उन छात्राओं की शिकायतों से जुड़ा है जिन्होंने संबंधित प्रोफेसर के निर्देशन में पीएचडी की थी। आंतरिक शिकायत समिति ने प्रोफेसर को दोषी ठहराते हुए उन्हें फटकार लगाई और भविष्य में किसी भी महिला शोधार्थी या शोध सहायक का मार्गदर्शन करने पर रोक लगाई।
प्रोफेसर ने हाईकोर्ट में इस आदेश को चुनौती देते हुए कहा कि शिकायतें कथित घटनाओं के छह महीने बाद दायर की गईं, जबकि POSH कानून में सामान्यतः तीन महीने के भीतर शिकायत दर्ज करने का प्रावधान है। उन्होंने यह भी आरोप लगाया कि उन्हें शिकायतों और पीड़िताओं के बयानों की प्रतियां उपलब्ध नहीं कराई गईं।
हाईकोर्ट ने पाया कि ICC की रिपोर्ट में कहीं भी यह उल्लेख नहीं है कि शिकायतों और संबंधित दस्तावेजों की प्रतियां प्रोफेसर को दी गई थीं। रिपोर्ट में यह भी स्पष्ट नहीं था कि जिरह का अवसर मांगा गया या नहीं और यदि मांगा गया तो उस पर क्या निर्णय लिया गया।
अदालत ने माना कि इस प्रकार ICC ने पॉश कानून के तहत निर्धारित प्रक्रिया का पूरी तरह पालन नहीं किया।
हाईकोर्ट ने कहा,
“कुछ परिस्थितियों में शिकायत दर्ज करने में हुई देरी को इतना प्रतिकूल नहीं माना जा सकता कि केवल उसी आधार पर शिकायत प्रारंभिक स्तर पर खारिज कर दी जाए। ऐसा करना POSH कानून के उद्देश्य के अनुरूप नहीं होगा। सामान्यतः ऐसी शिकायतें तुरंत दर्ज नहीं होतीं, विशेषकर तब जब शिकायतकर्ता आरोपी के अधीन कार्य कर रही हो और उसे अपने भविष्य पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ने की आशंका हो।”
हालांकि अदालत ने ICC का आदेश रद्द करते हुए मामले को दोबारा समिति के पास भेज दिया। हाईकोर्ट ने निर्देश दिया कि ICC शिकायतों की समयावधि, शिकायत दर्ज करने की वास्तविक तिथि और देरी के संबंध में शिकायतकर्ताओं द्वारा दिए गए कारणों पर विचार करे। इसके बाद ही यह तय किया जाए कि शिकायतों को प्रारंभिक स्तर पर खारिज किया जाना चाहिए या उनकी आगे सुनवाई की जानी चाहिए।