इलाहाबाद हाईकोर्ट ने कहा कि माता-पिता अपनी बालिग बेटी को उसकी साफ़ ज़ाहिर की गई इच्छा के खिलाफ़ अपने साथ रहने के लिए मजबूर करने के लिए 'हेबियस कॉर्पस' की रिट का इस्तेमाल नहीं कर सकते।

हाईकोर्ट ने कहा कि जब कोई बालिग व्यक्ति सोच-समझकर और अपनी मर्ज़ी से यह चुनता है कि उसे कहां रहना है, तो उसकी आज़ादी और फ़ैसला लेने की स्वतंत्रता को उचित सम्मान मिलना चाहिए।

जस्टिस संदीप जैन की बेंच ने कलावती देवी द्वारा दायर 'हेबियस कॉर्पस' याचिका खारिज करते हुए यह बात कही। कलावती देवी ने अपनी बेटी (कुमारी पूजा) को कोर्ट के सामने पेश करने की मांग की थी।

बेटी (25 साल) ने कोर्ट को बताया कि वह दिल्ली में स्वतंत्र रूप से रह रही थी और किसी व्यक्ति की गैर-कानूनी या अवैध हिरासत या नज़रबंदी में नहीं थी।

कोर्ट ने 17 अगस्त, 2026 को राज्य सरकार को बेटी को कोर्ट के सामने पेश करने का निर्देश दिया था। इसके बाद मऊ ज़िले के घोसी पुलिस स्टेशन के पुलिस अधिकारियों ने उसे कोर्ट के सामने पेश किया।

कोर्ट के साथ बातचीत के दौरान, पूजा ने कहा कि वह अपनी माँ के साथ नहीं रहना चाहती। उसने आरोप लगाया कि उसकी माँ का व्यवहार उसके प्रति अच्छा नहीं है और उसे अपने मायके में अक्सर मारपीट और दुर्व्यवहार का सामना करना पड़ा है।

हालांकि, माँ ने इन आरोपों से इनकार किया और इच्छा जताई कि उसकी बेटी उसके साथ मायके में रहे।

लेकिन, पूजा से बातचीत करने और उसके बयान पर पूरी तरह से विचार करने के बाद कोर्ट ने पाया कि वह बालिग है और उसने सोच-समझकर और अपनी मर्ज़ी से अपनी माँ के साथ न रहने की इच्छा ज़ाहिर की।

हाईकोर्ट ने कहा कि जब कोई व्यक्ति बालिग हो जाता है और अपने रहने की जगह के बारे में "साफ़, स्वैच्छिक और स्पष्ट फ़ैसला" ले लेता है, तो उसकी आज़ादी और फ़ैसला लेने की स्वतंत्रता को उचित सम्मान मिलना चाहिए।

कोर्ट ने आगे यह भी कहा:

"किसी बालिग व्यक्ति को उसकी साफ़ ज़ाहिर इच्छा के खिलाफ़ किसी खास व्यक्ति के साथ रहने के लिए मजबूर नहीं किया जा सकता। सिर्फ़ इसलिए कि वह व्यक्ति उसका माता-पिता है।"

कोर्ट ने समझाया कि 'हेबियस कॉर्पस' की कार्यवाही का मकसद गैर-कानूनी या अवैध हिरासत से आज़ादी दिलाना होता है। जब कोई अवैध हिरासत साबित नहीं होती है, तो आम तौर पर इसका इस्तेमाल किसी बालिग व्यक्ति को उसकी मर्ज़ी के खिलाफ़ किसी के साथ रहने के लिए मजबूर करने के लिए नहीं किया जा सकता।

इस मामले में कोर्ट को ऐसा कोई सबूत नहीं मिला जिससे यह पता चले कि संबंधित महिला को किसी तरह गैर-कानूनी तरीके से हिरासत में रखा गया था या उसकी आज़ादी छीनी जा रही है।

इसके विपरीत, उसने साफ़ तौर पर कहा था कि वह दिल्ली में अपनी मर्ज़ी से स्वतंत्र रूप से रह रही है और उसने सोच-समझकर अपनी माँ के साथ न रहने का फ़ैसला किया है।

यह मानते हुए कि 'हेबियस कॉर्पस' (बंदी प्रत्यक्षीकरण) याचिका को बनाए रखने का ज़रूरी आधार मौजूद नहीं है, कोर्ट ने याचिका खारिज की।

कोर्ट ने आगे यह भी निर्देश दिया कि संबंधित महिला, जो बालिग और सक्षम व्यक्ति है, अपनी पसंद की जगह पर और अपनी पसंद के व्यक्ति के साथ रहने के लिए स्वतंत्र रहेगी।

Case Title : Kalawati Devi And Another vs. State Of U.P. And 6 Others 2026 LiveLaw (AB) 785

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