इलाहाबाद हाईकोर्ट ने कहा कि किराए की संपत्ति पर स्वतंत्र मालिकाना हक का दावा करने वाला तीसरा व्यक्ति केवल इसलिए स्मॉल कॉज कोर्ट में बेदखली के मुकदमे का जरूरी या उचित पक्षकार नहीं बन जाता, क्योंकि उसका दावा मकान मालिक के मालिकाना हक से टकराता है।

कोर्ट ने स्पष्ट किया कि सिविल प्रक्रिया संहिता के आदेश 1 नियम 10 के तहत किसी तीसरे व्यक्ति को पक्षकार बनाने की प्रक्रिया का इस्तेमाल सीमित अधिकार क्षेत्र वाली बेदखली कार्यवाही में अलग मालिकाना विवाद लाने के लिए नहीं किया जा सकता।

जस्टिस डॉ. योगेंद्र कुमार श्रीवास्तव ने कहा कि केवल इस वजह से कि किराएदार किसी तीसरे व्यक्ति के मालिकाना हक का दावा करता है या उसके आधार पर वादी के स्वामित्व को चुनौती देता है, वह तीसरा व्यक्ति जरूरी या उचित पक्षकार नहीं बन जाता। अगर ऐसा किया जाए तो किराएदार की ओर से उठाए गए बचाव के आधार पर ही बेदखली की कार्यवाही का दायरा बढ़ जाएगा।

मामला अलीगढ़ की स्मॉल कॉज कोर्ट में दुकान से बेदखली और किराए की बकाया राशि से जुड़े मुकदमे का था। प्रतिवादी नंबर एक ने प्रतिवादी नंबर दो को किराएदार बताते हुए उसकी बेदखली की मांग की और 5 सितंबर 2017 की बिक्री विलेख के आधार पर दुकान पर अपना मालिकाना हक बताया।

याचिकाकर्ता ने इस मुकदमे में खुद को पक्षकार बनाए जाने की मांग की। उसका दावा था कि उसके पास 19 जून 2017 की पहले की बिक्री विलेख है और बाद की बिक्री विलेख उसके साथ धोखाधड़ी करके हासिल की गई। इस बिक्री विलेख को रद्द कराने के लिए उसने 2018 में अलग से मूल वाद संख्या 485/2018 दायर कर रखा है, जो अभी लंबित है।

स्मॉल कॉज कोर्ट ने उसे पक्षकार बनाने की अर्जी खारिज की थी। इसके बाद उसकी पुनरीक्षण याचिका भी खारिज हो गई। हाईकोर्ट में याचिकाकर्ता ने दलील दी कि किराएदार ने अपने लिखित बयान में उसे मकान मालकिन बताया और बेदखली के मुकदमे में आने वाला कोई भी निष्कर्ष उसके अधिकारों को प्रभावित कर सकता है।

हाईकोर्ट ने इस दलील को स्वीकार नहीं किया। कोर्ट ने कहा कि याचिकाकर्ता के मालिकाना हक के दावे का फैसला करने के लिए दोनों बिक्री विलेखों की वैधता, उनके निष्पादन और कानूनी प्रभाव के साथ-साथ धोखाधड़ी और गलत बयानी के आरोपों की जांच करनी होगी। ये सभी सवाल पहले से लंबित उसके स्वतंत्र दीवानी मुकदमे का विषय हैं।

अदालत ने कहा कि पक्षकार बनाए जाने की अर्जी को इस तरह इस्तेमाल नहीं किया जा सकता कि अलग से दायर मालिकाना हक के विवाद को स्मॉल कॉज कोर्ट के सामने लाया जाए और सीमित अधिकार क्षेत्र वाली बेदखली कार्यवाही में प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से उसका फैसला करा लिया जाए।

हाईकोर्ट ने कहा कि किसी व्यक्ति को पक्षकार बनाए जाने का सवाल इस बात पर निर्भर करता है कि मुकदमे में वास्तविक विवाद के निपटारे के लिए उसकी मौजूदगी जरूरी है या नहीं। संपत्ति में उसका दावा कितना बड़ा है यह अपने आप में उसे जरूरी पक्षकार बनाने का आधार नहीं है।

सुप्रीम कोर्ट के कनकलता दास एवं अन्य बनाम नबा कुमार दास एवं अन्य के फैसले का हवाला देते हुए हाईकोर्ट ने कहा कि बेदखली के मुकदमे में मकान मालिक और किराएदार जरूरी पक्षकार होते हैं। अपने ही एक पुराने फैसले मनोज बंसल बनाम जगदीश प्रसाद मित्तल एवं अन्य का भी हवाला देते हुए कोर्ट ने कहा कि याचिकाकर्ता के दावे पर फैसला करने के लिए दोनों बिक्री विलेखों और धोखाधड़ी के आरोपों की बाकायदा सुनवाई करनी होगी, जो उसके स्वतंत्र दीवानी मुकदमे में ही तय किए जाने चाहिए।

कोर्ट ने कहा कि मकान मालिक-किराएदार संबंध से जुड़ी कार्यवाही का दायरा केवल इसलिए नहीं बढ़ाया जा सकता कि स्वतंत्र मालिकाना हक का दावा करने वाला कोई व्यक्ति उसमें शामिल होकर अपने दावे का परीक्षण कराना चाहता है। ऐसे दावे का समाधान सक्षम अदालत के समक्ष विधिवत दायर मुकदमे में ही किया जाना चाहिए।

किराएदार के लिखित बयान का भी हाईकोर्ट ने संज्ञान लिया। पुनरीक्षण अदालत ने पाया कि किराएदार ने संशोधित लिखित बयान में प्रतिवादी नंबर एक को अपनी मकान मालकिन के रूप में स्वीकार किया। हाईकोर्ट ने कहा कि याचिकाकर्ता को यह आशंका कि स्मॉल कॉज कोर्ट के आदेश से उसके स्वतंत्र अधिकार प्रभावित हो सकते हैं, अपने आप में उसे पक्षकार बनाने का आधार नहीं है।

अदालत ने स्पष्ट किया कि जब स्वतंत्र मालिकाना हक का फैसला बेदखली के मुकदमे में मांगी गई राहत के लिए जरूरी नहीं है, तब केवल अपने अधिकारों की रक्षा के लिए कोई तीसरा व्यक्ति पक्षकार बनाए जाने की मांग नहीं कर सकता। याचिकाकर्ता के अधिकार पहले से लंबित उसके दीवानी मुकदमे में पूरी तरह तय किए जा सकते हैं।

इन टिप्पणियों के साथ हाईकोर्ट ने याचिका खारिज की। हालांकि, अदालत ने स्पष्ट किया कि उसने दोनों बिक्री विलेखों में से किसी की वैधता के संबंध में कोई राय व्यक्त नहीं की।

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