जेल में बंद आरोपी पर भी लगाया जा सकता है रासुका, यदि रिहाई पर सार्वजनिक व्यवस्था भंग होने की आशंका हो: इलाहाबाद हाइकोर्ट

Update: 2026-02-19 10:49 GMT

इलाहाबाद हाईकोर्ट की लखनऊ पीठ ने कहा कि यदि सक्षम प्राधिकारी को यह संतोष हो कि जेल में बंद आरोपी के जमानत पर रिहा होने की वास्तविक संभावना है और रिहाई के बाद वह सार्वजनिक व्यवस्था के प्रतिकूल गतिविधियों में संलग्न हो सकता है तो राष्ट्रीय सुरक्षा अधिनियम, 1980 के तहत निरोधात्मक आदेश पारित किया जा सकता है।

जस्टिस अब्दुल मोइन और जस्टिस बबीता रानी की खंडपीठ ने सुनील कुमार गुप्ता द्वारा दायर बंदी प्रत्यक्षीकरण याचिका खारिज करते हुए यह टिप्पणी की।

याचिका में उनके खिलाफ राष्ट्रीय सुरक्षा अधिनियम (रासुका) लगाए जाने को चुनौती दी गई, जबकि वे पहले से ही जेल में बंद थे।

मामला

निरोध आदेश के आधारों के अनुसार याचिकाकर्ता और उसके सहयोगियों ने मथुरा स्थित श्रीकृष्ण जन्मभूमि और द्वारकाधीश मंदिर के समीप अवैध खुदाई और निर्माण कार्य कराया। स्थानीय लोगों के विरोध के बावजूद खुदाई जारी रही, जिसके चलते पांच मकान ढह गए और आधा दर्जन मकानों में दरारें आ गईं। इस घटना में बच्चों सहित तीन लोगों की मृत्यु हो गई।

घटना के बाद क्षेत्र में अफरा-तफरी का माहौल बन गया यातायात बाधित हुआ और एनडीआरएफ तथा SDRF जैसी विशेष बलों को तैनात करना पड़ा।

याचिकाकर्ता को भारतीय न्याय संहिता (BNS) की धारा 105 के तहत दर्ज मामले में गिरफ्तार किया गया।

30 जून, 2025 को याचिकाकर्ता ने जमानत अर्जी दाखिल की। इसके दो दिन बाद, 2 जुलाई 2025 को मथुरा के जिला मजिस्ट्रेट ने उसके विरुद्ध राष्ट्रीय सुरक्षा अधिनियम (NSA) के तहत निरोध आदेश पारित कर दिया।

हाइकोर्ट का विचार

याचिकाकर्ता की ओर से दलील दी गई कि जब वह पहले से ही जेल में था, तब रासुका लगाने का कोई औचित्य नहीं था।

हालांकि पीठ ने NSA की धारा 3 का उल्लेख करते हुए इस तर्क को खारिज किया। अदालत ने कहा कि यदि निरोध प्राधिकारी को यह विश्वास हो कि आरोपी की जमानत पर रिहाई की वास्तविक संभावना है और रिहाई के बाद वह सार्वजनिक व्यवस्था के लिए हानिकारक गतिविधियों में संलग्न हो सकता है तो निरोध आदेश वैध रूप से पारित किया जा सकता है।

इस संदर्भ में अदालत ने सुप्रीम कोर्ट के निर्णय कमरुन्निसा बनाम भारत संघ, 1990' पर भरोसा किया, जिसमें कहा गया कि हिरासत में बंद व्यक्ति के खिलाफ भी निरोध आदेश वैध हो सकता है, बशर्ते प्राधिकारी को यह जानकारी हो कि वह हिरासत में है उसकी रिहाई की वास्तविक संभावना हो और रिहाई के बाद उसके द्वारा हानिकारक गतिविधियों में संलिप्त होने की आशंका हो।

खंडपीठ ने पाया कि निरोध प्राधिकारी को लंबित जमानत अर्जी की जानकारी थी और स्थानीय निवासियों में यह स्पष्ट आशंका थी कि रिहा होने पर याचिकाकर्ता फिर से अवैध गतिविधियां शुरू कर सकता है।

अदालत ने यह भी कहा कि याचिकाकर्ता के आपराधिक इतिहास को देखते हुए निरोध आदेश उचित था। उसके खिलाफ हत्या और आपराधिक धमकी जैसे गंभीर अपराधों में FIR दर्ज रही है, जिनमें गवाह भय के कारण सामने नहीं आए।

पीठ ने कहा,

“NSA के तहत निरोध आदेश पारित करते समय प्राधिकारी को यह संतोष दर्ज करना होता है कि निरुद्ध व्यक्ति की हिरासत सार्वजनिक व्यवस्था बनाए रखने के लिए आवश्यक है। इस संतोष तक पहुंचने में उसके पूर्व आचरण और आपराधिक पृष्ठभूमि पर विचार किया जा सकता है।”

प्रतिनिधित्व में देरी का मुद्दा

अदालत ने यह तर्क भी अस्वीकार कर दिया कि निरुद्ध व्यक्ति के अभ्यावेदन पर निर्णय लेने में अत्यधिक और अस्पष्ट देरी हुई।

पीठ ने कहा कि संविधान के अनुच्छेद 22(5) के तहत अभ्यावेदन का अधिकार महत्वपूर्ण है, परंतु देरी का आकलन करने के लिए कोई कठोर सूत्र नहीं अपनाया जा सकता। केवल वही देरी घातक मानी जाएगी जो अस्पष्ट हो या अधिकारियों की उदासीनता दर्शाए।

अदालत ने पाया कि प्रतिवादी प्राधिकारियों ने शपथपत्र के माध्यम से स्पष्ट किया कि उन्होंने अभ्यावेदन पर विधिवत विचार किया। याचिकाकर्ता को सलाहकार बोर्ड के समक्ष अपना पक्ष रखने का अवसर भी दिया गया।

इन तथ्यों के आधार पर पीठ ने कहा कि वह निरोध प्राधिकारी के व्यक्तिपरक संतोष में हस्तक्षेप नहीं कर सकती, जब तक यह न दिखे कि प्रासंगिक तथ्यों पर विचार नहीं किया गया।

परिणामस्वरूप, हैबियस कॉर्पस याचिका खारिज कर दी गई।

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