अपील लंबित रहते एक ही संपत्ति पर बुलडोजर कार्रवाई पर हाईकोर्ट सख्त, LDA की मंशा पर उठाए सवाल

Update: 2026-06-25 10:02 GMT

इलाहाबाद हाईकोर्ट ने एक अपील लंबित रहने के दौरान केवल एक संपत्ति पर ध्वस्तीकरण की कार्रवाई करने को लेकर लखनऊ विकास प्राधिकरण (LDA) को कड़ी फटकार लगाई।

अदालत ने प्रथम दृष्टया माना कि प्राधिकरण की कार्रवाई दुर्भावनापूर्ण प्रतीत होती है और फिलहाल आगे की ध्वस्तीकरण कार्रवाई पर रोक लगाई।

जस्टिस पंकज भाटिया और जस्टिस अमिताभ कुमार राय की खंडपीठ कंचन सिंह द्वारा दायर याचिका पर सुनवाई कर रही थी।

याचिका में आरोप लगाया गया था कि एलडीए ने उनकी संपत्ति के खिलाफ चुनिंदा और भेदभावपूर्ण तरीके से ध्वस्तीकरण की कार्रवाई की।

याचिकाकर्ता की ओर से कहा गया कि उन्होंने वैध विक्रय विलेख के आधार पर भूमि खरीदी थी। उनका दावा था कि निर्माण ऐसे क्षेत्रफल पर किया गया, जहां मानचित्र स्वीकृति की आवश्यकता नहीं थी इसलिए LDA से नक्शा पास नहीं कराया गया।

इसके बावजूद एलडीए ने उन्हें ध्वस्तीकरण नोटिस जारी किया और 30 नवंबर 2024 को अंतिम ध्वस्तीकरण आदेश पारित कर दिया।

इस आदेश के खिलाफ याचिकाकर्ता ने मंडलायुक्त के समक्ष वैधानिक अपील दायर की थी।

अदालत को बताया गया कि अपील पर नियमित सुनवाई चल रही थी और एलडीए भी उसमें पक्षकार के रूप में उपस्थित हो रहा था।

इसके बावजूद प्राधिकरण ने ध्वस्तीकरण की कार्रवाई कर दी। याचिकाकर्ता ने इसे पूरी तरह अवैध और चुनिंदा कार्रवाई बताया।

सुनवाई के दौरान याचिकाकर्ता ने कुछ तस्वीरें भी प्रस्तुत कीं, जिनसे यह दिखाने का प्रयास किया गया कि आसपास कई अन्य निर्माण भी समान परिस्थितियों में किए गए, लेकिन उनके खिलाफ न तो कोई कार्रवाई की गई और न ही उन्हें सील किया गया।

एलडीए की ओर से दलील दी गई कि संबंधित संपत्ति को पहले दो बार सील किया जा चुका था, लेकिन इसके बावजूद निर्माण कार्य जारी रखा गया। इसी कारण ध्वस्तीकरण की कार्रवाई की गई।

प्राधिकरण के वकील ने अदालत के समक्ष विशेष कार्याधिकारी देवांश त्रिवेदी द्वारा उपलब्ध कराए गए निर्देश भी रखे।

इनमें बताया गया कि क्षेत्र में लगभग 70 लोगों को नोटिस जारी किए गए थे और उनके खिलाफ भी ध्वस्तीकरण के आदेश पारित हुए। हालांकि यह स्वीकार किया गया कि अन्य किसी संपत्ति पर वास्तविक ध्वस्तीकरण नहीं किया गया।

इन तथ्यों पर गौर करते हुए हाईकोर्ट ने कहा कि प्रथम दृष्टया ऐसा प्रतीत होता है कि वास्तविक मुद्दे से ध्यान हटाने का प्रयास किया जा रहा है।

अदालत ने टिप्पणी की कि जब अपील लंबित थी और पक्षकार अपीलीय प्राधिकारी के समक्ष उपस्थित हो रहे थे तब ध्वस्तीकरण की कार्रवाई नहीं की जानी चाहिए थी।

खंडपीठ ने यह भी कहा कि प्रथम दृष्टया ऐसा लगता है कि केवल याचिकाकर्ता की संपत्ति को निशाना बनाया गया, जबकि आसपास की समान प्रकृति की अन्य संपत्तियों के खिलाफ कोई कार्रवाई नहीं की गई।

अदालत ने टिप्पणी की,

“प्रथम दृष्टया लखनऊ विकास प्राधिकरण की ओर से दुर्भावना स्थापित होती दिखाई देती है।”

मामले की गंभीरता को देखते हुए हाईकोर्ट ने अगली सुनवाई तक आगे की सभी ध्वस्तीकरण कार्रवाइयों पर रोक लगाई।

साथ ही अदालत ने लखनऊ विकास प्राधिकरण के उपाध्यक्ष और विशेष कार्याधिकारी देवांश त्रिवेदी को तीन सप्ताह के भीतर व्यक्तिगत शपथपत्र दाखिल करने का निर्देश दिया है।

उन्हें यह बताना होगा कि केवल एक संपत्ति के खिलाफ कार्रवाई क्यों की गई, जबकि आसपास कथित रूप से बिना स्वीकृत मानचित्र के बने अन्य निर्माणों के खिलाफ कोई कदम नहीं उठाया गया।

हाईकोर्ट ने यह भी संकेत दिया कि अगली सुनवाई पर वह उत्तर प्रदेश नगर नियोजन एवं विकास अधिनियम, 1973 की धारा 26-डी के तहत विशेष कार्याधिकारी देवांश त्रिवेदी के खिलाफ दंडात्मक कार्रवाई शुरू करने के प्रश्न पर भी विचार करेगा।

मामले की अगली सुनवाई निर्धारित तिथि पर की जाएगी।

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