इलाहाबाद हाईकोर्ट ने कहा कि उत्तर प्रदेश राजस्व संहिता, 2006 की धारा 67 के तहत होने वाली कार्यवाही में ऋषि पाल सिंह बनाम उत्तर प्रदेश राज्य मामले में बताई गई गाइडलाइन तब तक अनिवार्य नहीं हैं, जब तक राज्य सरकार उन्हें औपचारिक रूप से लागू नहीं करती। केवल इन गाइडलाइन का पालन न किए जाने के आधार पर बेदखली के आदेश को चुनौती नहीं दी जा सकती।

जस्टिस करुणेश सिंह पवार ने शाहबान बनाम उत्तर प्रदेश राज्य मामले में समन्वय पीठ के फैसले पर भरोसा करते हुए कहा कि धारा 67 के तहत कार्यवाही उत्तर प्रदेश राजस्व संहिता और उसके तहत बनाए गए नियमों में निर्धारित प्रक्रिया के अनुसार ही तय की जानी है।

मामला गांव सभा की जमीन पर कथित कब्जे से जुड़ा था। वर्ष 2018 में लेखपाल की रिपोर्ट के आधार पर याचिकाकर्ता के खिलाफ राजस्व संहिता की धारा 67 के तहत कार्यवाही शुरू की गई थी। रिपोर्ट में कहा गया कि याचिकाकर्ता ने गांव सभा की 0.006 हेक्टेयर जमीन पर पक्का मकान और चारदीवारी बना रखी है। राजस्व अभिलेखों में यह जमीन नवीन परती के रूप में दर्ज थी।

याचिकाकर्ता ने जुलाई 2018 में अपना आपत्ति पत्र दाखिल किया और साक्ष्य पेश करने के लिए समय मांगा। हालांकि, मार्च 2023 तक उसने कोई साक्ष्य पेश नहीं किया। इसके बाद उसे बेदखल करने का आदेश पारित किया गया और 5,000 रुपये क्षतिपूर्ति भी निर्धारित की गई। इस आदेश के खिलाफ दायर अपील भी खारिज कर दी गई।

इसके बाद याचिकाकर्ता ने हाईकोर्ट का रुख किया। उसका दावा था कि जिस जमीन पर मकान बना है, वह उसके अपने भूखंडों का हिस्सा है। उसने यह भी कहा कि लंबे समय से चली आ रही बीमारी के कारण वह कार्यवाही में उपस्थित नहीं हो सका।

याचिकाकर्ता ने ऋषि पाल सिंह मामले में दी गई गाइडलाइन का हवाला देते हुए तर्क दिया कि उत्तर प्रदेश राजस्व संहिता नियमावली, 2016 के नियम 67(2) के तहत जांच की प्रक्रिया नोटिस जारी करने से पहले जरूरी थी लेकिन उसके मामले में ऐसी जांच नहीं की गई।

राज्य सरकार की ओर से इसका विरोध करते हुए कहा गया कि निर्माण सार्वजनिक भूमि पर किया गया और याचिकाकर्ता को पर्याप्त अवसर दिए जाने के बावजूद उसने अपने दावे के समर्थन में कोई साक्ष्य पेश नहीं किया।

हाईकोर्ट ने कहा कि शाहबान मामले में समन्वय पीठ ने ऋषि पाल सिंह मामले में रिपोर्ट देने वाले अधिकारियों और व्यक्तियों से पूछताछ तथा उनसे जिरह करने की आवश्यकता को राजस्व संहिता में निर्धारित प्रक्रिया से अलग माना।

अदालत ने यह भी कहा कि यदि ऋषि पाल सिंह मामले की गाइडलाइन को पूरी तरह अनिवार्य बना दिया जाए तो धारा 67 के तहत बनाई गई संक्षिप्त प्रक्रिया नियमित मुकदमे की प्रक्रिया में बदल जाएगी।

हाईकोर्ट ने कहा कि मौजूदा मामले में याचिकाकर्ता यह नहीं बता सका कि उत्तर प्रदेश राजस्व संहिता या उसके तहत बनाए गए नियमों में निर्धारित किसी अनिवार्य प्रक्रिया का पालन नहीं किया गया। उसकी मुख्य शिकायत यह थी कि उसे पर्याप्त सुनवाई का अवसर नहीं मिला और ऋषि पाल सिंह मामले में बताई गई प्रक्रिया का पालन नहीं हुआ।

जस्टिस करुणेश सिंह पवार ने कहा कि बीमारी का आधार भी याचिकाकर्ता की मदद नहीं करता। अदालत ने पाया कि उसके द्वारा पेश किए गए मेडिकल दस्तावेज नवंबर 2023 या उसके बाद के थे, जबकि बेदखली का आदेश उससे पहले मार्च 2023 में पारित हो चुका था।

अदालत ने कहा कि 2018 में कार्यवाही शुरू होने से लेकर 2023 में आदेश पारित होने तक याचिकाकर्ता के पास अपनी आपत्ति के समर्थन में साक्ष्य पेश करने के लिए पर्याप्त समय था।

हाईकोर्ट ने कहा,

"इन तथ्यों को देखते हुए कार्यवाही पूरी होने और कई वर्ष बीत जाने के बाद याचिकाकर्ता अब यह सफलतापूर्वक नहीं कह सकता कि उसे सुनवाई का अवसर नहीं दिया गया।"

अदालत ने निचली राजस्व अदालतों के निष्कर्षों में एकरूपता को भी ध्यान में रखा। सुप्रीम कोर्ट के कनिज अहमद बनाम सबुद्दीन मामले का उल्लेख करते हुए हाईकोर्ट ने कहा कि जब कानून के अनुसार सार्वजनिक भूमि पर अतिक्रमण स्थापित हो जाता है तो संबंधित अधिकारी अतिक्रमणकारियों के प्रति अनावश्यक रूप से नरमी बरतने के लिए बाध्य नहीं हैं।

हाईकोर्ट ने याचिका खारिज करते हुए बेदखली की कार्रवाई में हस्तक्षेप करने से इनकार किया।

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