सिर्फ़ 'आखिरी बार साथ देखे जाने' के आधार पर हत्या की सज़ा नहीं दी जा सकती: इलाहाबादहाई कोर्ट ने 1996 के दोहरे हत्याकांड मामले में तीन लोगों को बरी किया
इलाहाबाद हाईकोर्ट ने पिछले हफ़्ते 1996 के दोहरे हत्याकांड मामले में तीन लोगों की सज़ा रद्द की। कोर्ट ने कहा कि परिस्थितिजन्य सबूतों (Circumstantial Evidence) पर आधारित मामले में, सिर्फ़ "आखिरी बार साथ देखे जाने" (Last Seen Together) के सिद्धांत या सबूत के आधार पर सज़ा को बरकरार नहीं रखा जा सकता, जब तक कि परिस्थितियों की कड़ी का हर हिस्सा बिना किसी शक के साबित न हो जाए।
कोर्ट ने पाया कि इस मामले में अभियोजन पक्ष (Prosecution) दोषी ठहराने वाली परिस्थितियों की पूरी कड़ी बनाने में नाकाम रहा और ट्रायल कोर्ट ने अविश्वसनीय "आखिरी बार साथ देखे जाने" के सबूत और कथित हत्या के हथियारों की संदिग्ध बरामदगी पर गलत तरीके से भरोसा किया।
जस्टिस सिद्धार्थ और जस्टिस विनय कुमार द्विवेदी की बेंच ने तीन दोषियों (शुरुआत में 6 दोषियों ने हाईकोर्ट में अपील की थी) की आपराधिक अपील को मंज़ूरी दी। इन लोगों ने ट्रायल कोर्ट के साल 2000 के उस फ़ैसले को चुनौती दी थी जिसमें उन्हें उम्रकैद की सज़ा सुनाई गई।
अपील के दौरान तीन अपीलकर्ताओं की मौत हो गई और एक अपीलकर्ता को नाबालिग घोषित कर दिया गया, इसलिए उनके मामले खत्म हो गए। कोर्ट ने बचे हुए अपीलकर्ताओं [शिव पाल, नर सिंह उर्फ़ नैया और धर्मवीर उर्फ़ धर्मपाल] को IPC की धारा 148 और 302 (धारा 149 के साथ) के तहत अपराधों से बरी कर दिया।
मामले का संक्षिप्त विवरण
अभियोजन पक्ष के अनुसार, 12 दिसंबर 1996 को नवाबगंज में ब्लॉक कंपाउंड के पास गेहूं के खेत में सोबरन और अवधेश के शव मिले थे।
एक स्थानीय निवासी से दो अज्ञात शवों के बारे में जानकारी मिलने के बाद अज्ञात लोगों के ख़िलाफ़ शुरुआती FIR दर्ज की गई।
बाद में शवों की पहचान होने पर मृतक सोबरन के पिता ने पुरानी दुश्मनी और कुछ ग्रामीणों से मिली कथित जानकारी के आधार पर आरोपियों के नाम बताते हुए एक और रिपोर्ट दर्ज कराई। इन ग्रामीणों का दावा था कि उन्होंने मृतकों को आखिरी बार आरोपियों के साथ देखा था।
हाईकोर्ट की टिप्पणियां
अभियोजन पक्ष के मामले की जांच करते हुए हाईकोर्ट ने पाया कि घटना का कोई चश्मदीद गवाह नहीं था और सज़ा पूरी तरह से अभियोजन पक्ष के तीन गवाहों के सबूतों पर टिकी थी। इन गवाहों का दावा था कि उन्होंने मृतकों को आखिरी बार आरोपी-अपीलकर्ताओं के साथ देखा था।
बेंच ने इन गवाहों के बयानों की बारीकी से जांच की और माना कि अभियोजन पक्ष ने अपने मामले को मज़बूत करने के लिए "सोच-समझकर और बाद में योजना बनाकर इन गवाहों को खड़ा किया।" कोर्ट ने यह भी पाया कि असल में इन गवाहों ने मरने से पहले मृतक सोबरन और अवधेश को आरोपियों के साथ नहीं देखा।
बेंच ने उनके व्यवहार को भी असामान्य माना, क्योंकि हत्या से कुछ समय पहले मृतकों को आरोपियों के साथ देखने का दावा करने के बावजूद, किसी ने भी यह जानकारी न तो मृतकों के परिवार को दी और न ही पुलिस को; यह जानकारी तब दी गई जब शव बरामद और उनकी पहचान हो गई।
बेंच ने कहा,
"अभियोजन पक्ष के इन गवाहों का व्यवहार और तरीका उनके सबूतों की सच्चाई और विश्वसनीयता पर उचित संदेह पैदा करता है... अभियोजन पक्ष के इन गवाहों के सबूतों को पढ़ने और समझने के बाद यह स्पष्ट है कि अपीलकर्ताओं को दोषी ठहराने के लिए इन गवाहों के सबूतों पर सुरक्षित रूप से भरोसा नहीं किया जा सकता है।"
सुप्रीम कोर्ट के रामब्रक्ष उर्फ जालिम बनाम छत्तीसगढ़ राज्य (2016), कृष्णन उर्फ रामासामी बनाम तमिलनाडु राज्य (2014) और कन्हैया लाल बनाम राजस्थान राज्य (2014) के फैसलों का हवाला देते हुए बेंच ने दोहराया कि "आखिरी बार साथ देखे जाने" (Last Seen Together) का सिद्धांत सबूत का एक कमजोर हिस्सा है और अकेले इसके आधार पर किसी को दोषी नहीं ठहराया जा सकता।
कोर्ट ने कहा कि यह सिद्धांत केवल तभी लागू होता है, जब आरोपी को मृतक के साथ आखिरी बार देखे जाने और मौत का पता चलने के बीच का समय इतना कम हो कि किसी अन्य व्यक्ति द्वारा अपराध करने की संभावना ही न रहे।
कोर्ट ने कहा कि इसके बावजूद, अभियोजन पक्ष को ऐसी परिस्थितियों की पूरी कड़ी साबित करनी होगी जो केवल आरोपी के दोषी होने की ओर इशारा करती हों।
हाईकोर्ट ने हत्याओं में कथित तौर पर इस्तेमाल किए गए 'गरासा' और 'टकोरा' की बरामदगी पर अभियोजन पक्ष के भरोसे में भी गंभीर कमियां पाईं। हालांकि फोरेंसिक साइंस लेबोरेटरी ने बरामद हथियारों पर इंसानी खून होने की रिपोर्ट दी थी, लेकिन यह साबित नहीं हो सका कि वह खून मृतकों में से किसी का था।
कोर्ट के अनुसार, अगर अभियोजन पक्ष यह साबित कर देता कि खून मृतकों का था, तो परिस्थितियों की कड़ी में एक अहम कड़ी जुड़ सकती थी। कोर्ट ने कहा कि ऐसे सबूत के अभाव में केवल बरामदगी के आधार पर आरोपी को कानूनी रूप से अपराध से नहीं जोड़ा जा सकता।
बेंच ने यह भी गौर किया कि जांच अधिकारी ने कथित हथियारों को छिपाने के बारे में आरोपी का कोई खुलासा बयान दर्ज नहीं किया।
सुप्रीम कोर्ट के हालिया फैसले 'वडला भीमाराईडू बनाम तेलंगाना राज्य, 2024' का हवाला देते हुए कोर्ट ने माना कि कथित बरामदगी संदिग्ध थी क्योंकि भारतीय साक्ष्य अधिनियम की धारा 27 के तहत खोज/बरामदगी के लिए जरूरी शर्तों को पूरा नहीं किया गया।
कोर्ट ने 'शरद बिरधीचंद सारदा बनाम महाराष्ट्र राज्य, 1984' मामले में संविधान पीठ के फैसले का जिक्र किया और कहा कि परिस्थितियों की कड़ी की हर कड़ी पूरी तरह से साबित होनी चाहिए और बिना किसी शक के आरोपी के दोषी होने की ओर इशारा करना चाहिए। साथ ही किसी भी अन्य संभावित संभावना को खारिज करना चाहिए।
मौजूदा मामले में उन सिद्धांतों को लागू करते हुए बेंच ने निष्कर्ष निकाला कि यह मामला न तो भरोसेमंद "आखिरी बार देखे जाने" (Last Seen) के सबूत से समर्थित था और न ही ऐसे ठोस परिस्थितिजन्य सबूतों से जो अपीलकर्ताओं के खिलाफ कड़ी को पूरा कर सकें।
कोर्ट ने पाया कि ट्रायल कोर्ट ने गलत निष्कर्ष निकाला था कि अभियोजन पक्ष ने मामले को संदेह से परे साबित किया।
ट्रायल कोर्ट के फैसले को "गलत और गैर-कानूनी" और कानून की नजर में टिकने लायक न मानते हुए हाईकोर्ट ने अपील स्वीकार कर ली। कोर्ट ने जीवित अपीलकर्ताओं की दोषसिद्धि और सजा रद्द की।
Case Title - Sobaran & Ors. vs. State of Uttar Pradesh 2026 LiveLaw (AB) 516