स्टाम्प शुल्क निर्धारण के लिए यूपी जमींदारी उन्मूलन एवं भूमि सुधार अधिनियम लागू नहीं: इलाहाबाद हाईकोर्ट
इलाहाबाद हाईकोर्ट ने स्पष्ट किया कि भारतीय स्टाम्प अधिनियम, 1899 के तहत भूमि के बाजार मूल्य का निर्धारण करने के लिए उत्तर प्रदेश जमींदारी उन्मूलन एवं भूमि सुधार अधिनियम, 1950 (UPZALR Act) को आधार नहीं बनाया जा सकता। अदालत ने कहा कि दोनों कानूनों के उद्देश्य अलग-अलग हैं। जमींदारी उन्मूलन अधिनियम स्टांप शुल्क निर्धारण को नियंत्रित नहीं करता।
जस्टिस सैयद क़मर हसन रिज़वी ने यह अहम फैसला सुनाते हुए कहा कि UPZALR Act के तहत धारा 143 की अधिसूचना अधिकतम एक सहायक कारक हो सकती है, लेकिन इसके आधार पर ही बाजार मूल्य तय नहीं किया जा सकता। बाजार मूल्य का निर्धारण भारतीय स्टाम्प अधिनियम और उत्तर प्रदेश स्टांप (संपत्ति मूल्यांकन) नियम, 1997 के अनुसार ही किया जाना चाहिए।
अदालत ने यह भी स्पष्ट किया कि किसी भूमि का मूल्यांकन केवल इस आधार पर नहीं किया जा सकता कि उसका उपयोग आवासीय है या व्यावसायिक। इसके लिए आसपास की संपत्तियों की प्रचलित बिक्री दर, समान प्रकृति और लाभकारी विशेषताओं वाली भूमि के सौदे तथा वास्तविक बाजार परिस्थितियों को भी ध्यान में रखना आवश्यक है।
यह मामला बाराबंकी की एक महिला याचिकाकर्ता से जुड़ा था, जिन्होंने एक भूखंड खरीदा था और ₹46 लाख प्रति हेक्टेयर की दर से स्टांप शुल्क अदा किया। उनका कहना था कि गांव की आवासीय बस्ती के निकट होने के कारण उन्होंने पहले ही लगभग 150 प्रतिशत अधिक मूल्य पर स्टाम्प शुल्क चुका दिया। कुल संपत्ति मूल्य लगभग 20.53 लाख था और उन्होंने 92,650 स्टांप शुल्क जमा किया।
हालांकि, कलेक्टर बाराबंकी ने स्टांप शुल्क में कमी बताते हुए 4,28,850 की अतिरिक्त मांग की और 1 लाख का जुर्माना भी लगा दिया। यह भी कहा गया कि भले ही सेल डीड में भूमि को कृषि भूमि बताया गया हो, लेकिन वहां कोई कृषि कार्य नहीं हो रहा था और आसपास दुकानें व प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र मौजूद थे।
याचिकाकर्ता ने दलील दी कि आदेश एकतरफा (एक्स-पार्टी) था और भूमि का मूल्यांकन भविष्य की संभावित व्यावसायिक उपयोगिता के आधार पर किया गया, जो कानूनन गलत है। उन्होंने यह भी कहा कि नोटिस विधिवत रूप से तामील नहीं किया गया और न ही कोई मौखिक या दस्तावेजी साक्ष्य लिया गया।
हाईकोर्ट ने अपने पूर्व के फैसलों, जैसे राम गोपाल बनाम उत्तर प्रदेश राज्य, राम खेलावन उर्फ बच्चा बनाम राज्य, अजय अग्रवाल बनाम आयुक्त और रीना गुप्ता बनाम राज्य का हवाला देते हुए कहा कि बाजार मूल्य घोषित मूल्य से अधिक होने का भार राज्य पर होता है। इसके लिए ठोस साक्ष्य प्रस्तुत करना अनिवार्य है।
अदालत ने यह भी दोहराया कि केवल भविष्य में संभावित व्यावसायिक उपयोग की आशंका के आधार पर स्टाम्प शुल्क की कमी नहीं निकाली जा सकती, खासकर जब कलेक्टर आसपास की संपत्तियों के किसी तुलनात्मक बिक्री उदाहरण (एक्ज़ेम्पलर) को प्रस्तुत करने में विफल रहा हो।
इन सभी तथ्यों को ध्यान में रखते हुए हाईकोर्ट ने कलेक्टर द्वारा पारित आदेशों को गंभीर त्रुटिपूर्ण और मनमाना बताते हुए रद्द कर दिया। साथ ही निर्देश दिया कि याचिकाकर्ता द्वारा याचिका लंबित रहने के दौरान जमा की गई राशि उसे वापस की जाए।