चाइल्ड वेलफेयर कमेटी के आदेश के खिलाफ हेबियस कॉर्पस याचिका नहीं चलेगी: इलाहाबाद हाईकोर्ट
इलाहाबाद हाईकोर्ट ने स्पष्ट किया कि यदि किसी व्यक्ति को चाइल्ड वेलफेयर कमेटी के आदेश के तहत रखा गया तो उसके खिलाफ हेबियस कॉर्पस याचिका दाखिल नहीं की जा सकती। अदालत ने कहा कि ऐसे मामलों में विधि के तहत अलग से अपील और पुनरीक्षण का प्रावधान मौजूद है।
जस्टिस संदीप जैन ने सुनवाई के दौरान कहा कि जब किसी व्यक्ति की हिरासत किसी सक्षम प्राधिकरण या चाइल्ड वेलफेयर कमेटी के वैध आदेश के आधार पर होती है तो उसे हेबियस कॉर्पस याचिका के माध्यम से चुनौती नहीं दी जा सकती।
अदालत ने अपने फैसले में कहा,
“यदि किसी व्यक्ति को न्यायिक आदेश या सक्षम प्राधिकरण के आदेश के तहत रखा गया है तो ऐसे आदेश को हेबियस कॉर्पस याचिका में चुनौती नहीं दी जा सकती।”
मामले में याचिकाकर्ता कथित रूप से महिला का पति है। उसने दावा किया कि उसकी पत्नी को अवैध रूप से मथुरा स्थित राजकीय बाल गृह में रखा गया है और उसकी रिहाई की मांग की।
हालांकि, राज्य की ओर से दलील दी गई कि संबंधित महिला को चाइल्ड वेलफेयर कमेटी के आदेश के तहत रखा गया, इसलिए यह हिरासत अवैध नहीं है और हेबियस कॉर्पस याचिका सुनवाई योग्य नहीं है।
हाईकोर्ट ने कहा कि किशोर न्याय अधिनियम, 2015 एक पूर्ण कानून है, जिसमें ऐसे आदेशों को चुनौती देने के लिए स्पष्ट व्यवस्था दी गई। इसके तहत संबंधित व्यक्ति पहले अपील कर सकता है और आवश्यक होने पर उच्च अदालत में पुनर्विचार का विकल्प भी उपलब्ध है।
अदालत ने यह भी दोहराया कि जब वैकल्पिक कानूनी उपाय मौजूद हैं तो सीधे हेबियस कॉर्पस याचिका दाखिल करना उचित नहीं है।
इन सभी तथ्यों को ध्यान में रखते हुए हाईकोर्ट ने याचिका खारिज की।