पंचनामा रिपोर्ट पर गवाह के हस्ताक्षर न होने से उसकी गवाही खारिज नहीं की जा सकती: इलाहाबाद हाईकोर्ट
इलाहाबाद हाईकोर्ट ने 1998 के एक चर्चित हत्या मामले में दोषी ठहराए गए व्यक्ति की आजीवन कारावास की सजा बरकरार रखते हुए स्पष्ट किया कि केवल इस आधार पर किसी प्रत्यक्षदर्शी गवाह की गवाही को खारिज नहीं किया जा सकता कि उसके हस्ताक्षर पंचनामा रिपोर्ट या अन्य पुलिस दस्तावेजों पर नहीं हैं।
जस्टिस सलील कुमार राय और जस्टिस अजय कुमार-द्वितीय की खंडपीठ ने कहा कि कानून में कहीं भी यह अनिवार्य नहीं है कि पंचनामा रिपोर्ट में FIR का विवरण, आरोपियों के नाम, प्रत्यक्षदर्शी गवाहों के नाम या उनके बयानों का सार दर्ज किया जाए, अथवा उस पर प्रत्यक्षदर्शी गवाहों के हस्ताक्षर कराए जाएं।
मामला वर्ष 1998 में हुई एक दिनदहाड़े हत्या से जुड़ा है। अभियोजन के अनुसार, मृतक के पिता महीपाल सिंह और गांव के एक अन्य व्यक्ति के बीच वर्ष 1972 से भूमि विवाद चल रहा था। बाद में महीपाल सिंह मुकदमा जीत गए और अदालत की नीलामी में आरोपियों के परिवार की पुश्तैनी जमीन खरीद ली। इसी कारण दोनों पक्षों के बीच गहरी दुश्मनी पैदा हो गई।
10 अप्रैल 1998 की सुबह मृतक जगपाल सिंह अपने बहनोई श्री ओम के साथ साइकिल से वकील से मिलने जा रहा था। रास्ते में चार लोगों ने उन पर हमला कर दिया। अभियोजन के अनुसार, आरोपियों ने पहले लाठियों से हमला किया और बाद में तमंचों तथा चाकुओं से वार कर जगपाल सिंह की हत्या कर दी।
मुकदमे की सुनवाई के बाद निचली अदालत ने सभी आरोपियों को दोषी ठहराते हुए आजीवन कारावास की सजा सुनाई। बाद में अपील लंबित रहने के दौरान तीन सह-आरोपियों की मृत्यु हो गई और हाइकोर्ट के समक्ष केवल प्रवेश नामक आरोपी की अपील शेष रह गई।
सुनवाई के दौरान बचाव पक्ष ने तर्क दिया कि मृतक के पिता और बहनोई घटनास्थल पर मौजूद नहीं थे, क्योंकि उनके हस्ताक्षर पंचनामा रिपोर्ट और बरामदगी संबंधी दस्तावेजों में नहीं हैं।
हाईकोर्ट ने इस दलील को खारिज करते हुए कहा कि दंड प्रक्रिया संहिता (CrPC) की धारा 174 के तहत पंचनामा का उद्देश्य केवल मृत्यु के कारण और परिस्थितियों का पता लगाना होता है। इसमें प्रत्यक्षदर्शी गवाहों के नाम या उनके बयान दर्ज करना आवश्यक नहीं है।
अदालत ने कहा कि किसी गवाह का नाम पंचनामा रिपोर्ट में न होना उसकी गवाही को अविश्वसनीय नहीं बनाता।
खंडपीठ ने यह भी कहा कि जब किसी मामले में भरोसेमंद प्रत्यक्षदर्शी साक्ष्य मौजूद हों, तब अभियोजन के लिए हत्या का उद्देश्य अलग से साबित करना आवश्यक नहीं होता।
अदालत ने टिप्पणी की,
"जब प्रत्यक्षदर्शी गवाही अदालत का विश्वास जीतती है, तब उद्देश्य साबित न होने से अभियोजन का मामला कमजोर नहीं पड़ता। उद्देश्य का महत्व मुख्य रूप से परिस्थितिजन्य साक्ष्य वाले मामलों में होता है।"
हाईकोर्ट ने यह भी माना कि इस मामले में भूमि विवाद के कारण हत्या का स्पष्ट कारण मौजूद था।
एक अन्य दलील में बचाव पक्ष ने कहा कि अभियोजन ने एक अन्य नामित प्रत्यक्षदर्शी को गवाही के लिए पेश नहीं किया, इसलिए उसके खिलाफ प्रतिकूल निष्कर्ष निकाला जाना चाहिए।
इस तर्क को भी अदालत ने अस्वीकार किया। खंडपीठ ने कहा कि साक्ष्य अधिनियम के अनुसार किसी अपराध को सिद्ध करने के लिए गवाहों की निश्चित संख्या आवश्यक नहीं है। महत्वपूर्ण यह है कि प्रस्तुत साक्ष्य कितना विश्वसनीय है।
अदालत ने कहा,
"मात्र संख्या नहीं, बल्कि साक्ष्य की गुणवत्ता महत्वपूर्ण होती है। यदि एक भी गवाह पूरी तरह विश्वसनीय है तो उसकी गवाही के आधार पर दोषसिद्धि की जा सकती है।"
हाईकोर्ट ने पाया कि मृतक के पिता और बहनोई दोनों घटनास्थल पर मौजूद थे तथा उन्होंने घटना का एक समान और सुसंगत विवरण दिया। उनकी गवाही विश्वसनीय और भरोसेमंद है।
इन निष्कर्षों के आधार पर हाईकोर्ट ने प्रवेश की अपील खारिज की और ट्रायल कोर्ट द्वारा सुनाई गई आजीवन कारावास की सजा बरकरार रखी।