प्रत्यक्षदर्शी साक्ष्य से अपराध साबित हो जाए तो मकसद का महत्व कम हो जाता है: इलाहाबाद हाईकोर्ट
इलाहाबाद हाईकोर्ट ने कहा कि यदि किसी अपराध की घटना प्रत्यक्षदर्शी गवाहों की विश्वसनीय गवाही से साबित हो जाती है तो केवल इस आधार पर अभियोजन का मामला खारिज नहीं किया जा सकता कि अपराध का मकसद सिद्ध नहीं हुआ या उसके बारे में कुछ संदेह है।
जस्टिस रजनीश कुमार और जस्टिस जफीर अहमद की खंडपीठ ने यह टिप्पणी करते हुए वर्ष 2015 में बाराबंकी में एक प्रमुख आश्रम प्रमुख की हत्या के मामले में दोषी ठहराए गए हरेराम चौधरी की दोषसिद्धि और आजीवन कारावास की सजा बरकरार रखी।
अभियोजन के अनुसार, घटना 15 और 16 मई 2015 की मध्यरात्रि को पुरुषोत्तम धाम आश्रम में हुई थी। ठाकुर सदानंद तत्वज्ञान परिषद के प्रधान सचिव ठाकुर राम सहाय सिंह आश्रम परिसर के खलिहान में सो रहे थे। रात करीब दो बजे हरेराम चौधरी ने उनके सिर में गोली मार दी।
मामले के प्रत्यक्षदर्शी गवाहों के अनुसार, घटना के समय आरोपी के अन्य साथी अंधेरे में मौजूद थे और उसे उकसाते हुए चिल्ला रहे थे, "मारो, बचने न पाए।"
मार्च 2018 में बाराबंकी की फास्ट ट्रैक अदालत ने आरोपी को भारतीय दंड संहिता (IPC) की धारा 302 तथा शस्त्र अधिनियम की धारा 3/25 के तहत दोषी ठहराते हुए आजीवन कारावास की सजा सुनाई।
इस फैसले को चुनौती देते हुए आरोपी ने हाईकोर्ट में अपील दायर की। उसकी ओर से तर्क दिया गया कि FIR दर्ज करने में लगभग 11 घंटे की देरी हुई, जिसका कोई संतोषजनक स्पष्टीकरण नहीं है। यह भी कहा गया कि जांच के दौरान छह अन्य सह-आरोपियों के नाम हटा दिए गए थे और हत्या का कोई स्पष्ट मकसद भी साबित नहीं हुआ।
राज्य सरकार ने इन दलीलों का विरोध करते हुए निचली अदालत के फैसले का समर्थन किया।
FIR दर्ज करने में देरी के मुद्दे पर हाईकोर्ट ने कहा कि आश्रम प्रमुख की अचानक हत्या के बाद वहां भय, दहशत और भ्रम का माहौल बन गया। साथ ही हमलावरों ने घटना की सूचना देने वालों को गंभीर परिणाम भुगतने की धमकी भी दी थी।
अदालत ने माना कि ऐसी परिस्थितियों में अगले दिन सुबह FIR दर्ज होना अस्वाभाविक नहीं कहा जा सकता। खंडपीठ ने कहा कि यदि देरी का उचित स्पष्टीकरण मौजूद हो और रिकॉर्ड पर उपलब्ध साक्ष्य FIR के संस्करण का समर्थन करते हों तो केवल देरी के आधार पर अभियोजन का मामला खारिज नहीं किया जा सकता।
मकसद के मुद्दे पर अदालत ने कहा कि अपराध करने में उसका महत्व अवश्य होता है, लेकिन जब प्रत्यक्षदर्शी साक्ष्य उपलब्ध हों, तब उसका महत्व कम हो जाता है।
अदालत ने कहा,
"मकसद आरोपी के मन में छिपा रहता है, इसलिए हर मामले में उसे प्रत्यक्ष और ठोस साक्ष्य से साबित करना कठिन होता है। इसे परिस्थितियों, उपलब्ध सामग्री और पक्षकारों के आचरण से समझा जा सकता है।"
पीठ ने यह भी कहा कि मजबूत मकसद होने मात्र से दोषसिद्धि नहीं हो सकती और मकसद के अभाव मात्र से आरोपी को बरी भी नहीं किया जा सकता।
अदालत ने ध्यान दिलाया कि आरोपी ने दंड प्रक्रिया संहिता (CrPC) की धारा 313 के तहत दिए गए अपने बयान में मृतक के साथ दुश्मनी स्वीकार की थी। इसलिए अपराध के पीछे कारण होने से पूरी तरह इनकार नहीं किया जा सकता।
हाईकोर्ट ने अपराध में प्रयुक्त 315 बोर के देशी तमंचे की बरामदगी को भी वैध माना। अदालत ने कहा कि यह बरामदगी आरोपी के खुलासे के आधार पर साक्ष्य अधिनियम की धारा 27 के तहत की गई।
प्रत्यक्षदर्शी गवाहों की गवाही पर भरोसा जताते हुए अदालत ने कहा कि उनके बयान समय, स्थान, हमले के तरीके, घटनास्थल पर प्रकाश की व्यवस्था और आरोपी की पहचान जैसे सभी महत्वपूर्ण पहलुओं पर एक-दूसरे की पुष्टि करते हैं।
अदालत ने कहा,
"उनकी गवाही सुसंगत, विश्वसनीय और परस्पर पुष्टिकारी है। जिरह के दौरान ऐसा कुछ भी सामने नहीं आया, जिससे उनकी उपस्थिति संदिग्ध लगे या उनकी गवाही अविश्वसनीय साबित हो।"
इन्हीं तथ्यों के आधार पर हाईकोर्ट ने निष्कर्ष निकाला कि अभियोजन पक्ष ने संदेह से परे जाकर अपना मामला सिद्ध कर दिया। अदालत ने कहा कि निचली अदालत के फैसले में कोई कानूनी त्रुटि, अवैधता या विकृति नहीं है।
फलस्वरूप, हाईकोर्ट ने दोषसिद्धि और आजीवन कारावास की सजा को बरकरार रखते हुए आरोपी की अपील खारिज की।