अदालत की तय समयसीमा के बाद बिना अनुमति बढ़ाए चली विभागीय कार्रवाई अमान्य हो सकती है: इलाहाबाद हाईकोर्ट
इलाहाबाद हाईकोर्ट ने महत्वपूर्ण फैसले में कहा कि यदि अदालत द्वारा तय समयसीमा समाप्त होने के बाद विभागीय कार्रवाई पूरी की जाती है और संबंधित प्राधिकारी समय बढ़ाने के लिए कोई वास्तविक प्रयास नहीं करता तो ऐसी कार्रवाई अमान्य मानी जा सकती ह
जस्टिस श्री प्रकाश सिंह ने यूनियन ऑफ इंडिया बनाम शरवन कुमार मामला और उत्तर प्रदेश राज्य बनाम राम प्रकाश सिंह मामला के फैसलों का हवाला देते हुए कहा कि हर मामले में तय समय के भीतर विभागीय जांच पूरी कर पाना संभव नहीं होता। ऐसे में संबंधित प्राधिकारी समयसीमा समाप्त होने से पहले अदालत से समय बढ़ाने की मांग कर सकता है।
अदालत ने कहा कि कुछ असाधारण परिस्थितियों में समय समाप्त होने के बाद भी विस्तार की मांग की जा सकती है, लेकिन यह अदालत के विवेक पर निर्भर करेगा। साथ ही यदि समय बढ़ाने के लिए कोई ईमानदार प्रयास ही नहीं किया गया हो, तो समयसीमा के बाद जारी विभागीय कार्रवाई को रोका जा सकता है।
मामला एक महिला प्राचार्य से जुड़ा था, जिन्होंने वर्ष 1993 में हिंदी प्रवक्ता के रूप में सेवा शुरू की थी। बाद में सीतापुर के एक इंटर कॉलेज में प्राचार्य बनीं। याचिका के अनुसार संस्थान में तबादलों को लेकर विवाद हुआ, जिसके बाद उनके निलंबन की संस्तुति की गई।
पहला निलंबन आदेश हाईकोर्ट ने यह कहते हुए रद्द किया था कि वह सक्षम प्राधिकारी द्वारा पारित नहीं किया गया। बाद में जिला विद्यालय निरीक्षक द्वारा जारी दूसरा निलंबन आदेश भी अदालत ने रद्द कर दिया और सक्षम प्राधिकारी को 51 दिनों के भीतर विभागीय कार्रवाई पूरी करने का निर्देश दिया।
हालांकि, अंतिम आदेश 71 दिन बाद पारित किया गया, जिसके खिलाफ याचिकाकर्ता फिर हाईकोर्ट पहुंचीं। उनका कहना था कि अदालत द्वारा तय समयसीमा बीत जाने के बाद बिना अनुमति विभागीय कार्रवाई जारी नहीं रखी जा सकती।
दूसरी ओर प्रतिवादियों ने दलील दी कि केवल समयसीमा समाप्त होने से कार्रवाई स्वतः समाप्त नहीं हो जाती और अदालत जरूरत पड़ने पर समय बढ़ा सकती है।
मामले की सुनवाई करते हुए हाईकोर्ट ने कहा कि दोनों सुप्रीम कोर्ट फैसलों में कोई विरोधाभास नहीं है। अदालत ने स्पष्ट किया कि विभागीय कार्रवाई का उद्देश्य केवल समयसीमा के कारण बाधित नहीं होना चाहिए, लेकिन इसके लिए समय विस्तार मांगने का वास्तविक प्रयास जरूरी है।
जस्टिस श्री प्रकाश सिंह ने कहा,
“यदि समयसीमा बढ़ाने के लिए कोई ईमानदार प्रयास नहीं किया गया हो तो समयसीमा के बाद जारी विभागीय कार्रवाई न्यायिक हस्तक्षेप को आमंत्रित कर सकती है।”
मौजूदा मामले में अदालत ने पाया कि संबंधित प्राधिकारी ने समय बढ़ाने के लिए कोई आवेदन या प्रयास नहीं किया। इसलिए 71 दिन बाद पारित आदेश को अवैध मानते हुए रद्द कर दिया गया।
हालांकि अदालत ने विभागीय प्राधिकारियों को यह छूट दी कि वे याचिकाकर्ता को जवाब दाखिल करने का अवसर देकर दो महीने के भीतर नई कार्रवाई पूरी कर सकते हैं।