पीड़िता की गवाही पर भरोसा कायम, मां का बयान न होना घातक नहीं: इलाहाबाद हाईकोर्ट ने 1984 दुष्कर्म मामले में सजा बरकरार रखी
इलाहाबाद हाईकोर्ट ने वर्ष 1984 के दुष्कर्म मामले में आरोपी की सजा बरकरार रखते हुए स्पष्ट किया कि यदि पीड़िता की गवाही विश्वसनीय और अटूट है, तो अन्य गवाहों के बयान न होने से अभियोजन का मामला कमजोर नहीं होता।
जस्टिस मनोज बजाज की पीठ ने आजमगढ़ के एडिशनल सेशन कोर्ट के वर्ष 1986 के फैसले को सही ठहराते हुए आरोपी की अपील खारिज की। ट्रायल कोर्ट ने आरोपी को भारतीय दंड संहिता (IPC) की धारा 376 के तहत दोषी मानते हुए 7 साल की कठोर कारावास और जुर्माने की सजा सुनाई।
मामले के अनुसार, 7 अक्टूबर 1984 को 15 वर्ष से कम आयु की पीड़िता गांव में अरहर के खेत के पास बकरी चरा रही थी। तभी आरोपी उसे जबरन उठाकर खेत में ले गया और उसके साथ दुष्कर्म किया। घटना के दौरान पीड़िता को गंभीर चोटें आईं, अत्यधिक रक्तस्राव हुआ और वह बेहोश हो गई।
पीड़िता की चीख सुनकर उसकी मां सहित अन्य लोग मौके पर पहुंचे, जिसके बाद आरोपी फरार हो गया।
हाईकोर्ट में आरोपी की ओर से दलील दी गई कि उसे झूठा फंसाया गया और अभियोजन ने जानबूझकर पीड़िता की मां और एक अन्य गवाह को पेश नहीं किया। यह भी कहा गया कि चोटें गिरने से भी हो सकती थीं।
अदालत ने इन तर्कों को खारिज करते हुए कहा कि पीड़िता ने शुरू से ही आरोपी का नाम लिया और अदालत में भी अपने बयान पर कायम रही। लंबी क्रॉस एग्जामिनेशन के बावजूद उसकी गवाही कमजोर नहीं पड़ी।
अदालत ने कहा,
“सिर्फ इस कारण कि पीड़िता की मां और एक अन्य गवाह का बयान नहीं लिया गया, अभियोजन के मामले पर संदेह नहीं किया जा सकता, खासकर जब पीड़िता की गवाही स्पष्ट और विश्वसनीय है।”
अदालत ने मेडिकल साक्ष्यों पर भी भरोसा जताया, जिसमें पीड़िता के शरीर से रक्तस्राव और उसके कपड़ों पर खून के धब्बे होने की पुष्टि हुई।
इन सभी तथ्यों को ध्यान में रखते हुए हाईकोर्ट ने पाया कि आरोपी के खिलाफ अपराध सिद्ध है और सजा में हस्तक्षेप का कोई आधार नहीं बनता। परिणामस्वरूप आरोपी की अपील खारिज कर दी गई।