नाबालिग की उम्र दस्तावेज़ से साबित हो जाए तो बोन ऑसिफिकेशन टेस्ट जरूरी नहीं: इलाहाबाद हाईकोर्ट
इलाहाबाद हाईकोर्ट ने महत्वपूर्ण फैसला देते हुए कहा कि यदि उपलब्ध दस्तावेज़ों से यह स्पष्ट हो जाए कि आरोपी घटना के समय नाबालिग था तो उसकी उम्र निर्धारित करने के लिए बोन ऑसिफिकेशन टेस्ट (हड्डी परीक्षण) कराने की कोई आवश्यकता नहीं है।
जस्टिस मनीष कुमार ने किशोर न्याय (बालकों की देखभाल और संरक्षण) अधिनियम, 2015 (POCSO Act) की धारा 94 का हवाला देते हुए यह स्पष्ट किया।
अदालत ने कहा,
“यदि उपलब्ध दस्तावेज़ों से ही यह साबित हो रहा है कि आरोपी घटना के समय 16 वर्ष से कम उम्र का था तो ऐसे में जुवेनाइल जस्टिस बोर्ड द्वारा ऑसिफिकेशन टेस्ट का आदेश देना उचित नहीं है।”
मामला एक ऐसे आरोपी से जुड़ा था, जिस पर भारतीय न्याय संहिता (BNS) की धाराओं तथा POCSO Act, 2012 के तहत आरोप लगाए गए। आरोपी की उम्र को लेकर विवाद था एक पक्ष ने हाईस्कूल प्रमाणपत्र के आधार पर उम्र लगभग 15 वर्ष बताई, जबकि दूसरे पक्ष ने स्कूल रजिस्टर के आधार पर अलग आंकड़ा पेश किया।
जुवेनाइल जस्टिस बोर्ड (JJB) ने उम्र तय करने के लिए ऑसिफिकेशन टेस्ट का आदेश दिया, जिसे स्पेशल पॉक्सो कोर्ट ने भी सही ठहराया। इसके बाद मामला हाईकोर्ट पहुंचा।
हाईकोर्ट ने कहा कि कानून के अनुसार उम्र निर्धारण के लिए प्राथमिकता दस्तावेज़ों को दी जाती है, जैसे स्कूल प्रमाणपत्र या जन्म प्रमाणपत्र। मेडिकल परीक्षण केवल तभी कराया जा सकता है, जब ऐसे दस्तावेज़ उपलब्ध न हों।
अदालत ने पाया कि दोनों उपलब्ध दस्तावेज़ों में आरोपी की उम्र 16 वर्ष से कम ही दर्शाई गई, इसलिए मेडिकल परीक्षण की आवश्यकता नहीं थी।
इसी आधार पर हाईकोर्ट ने ट्रायल कोर्ट के आदेश को गलत ठहराते हुए संशोधन याचिका स्वीकार की।