क्या हिंदुओं को भी घर में सामूहिक पूजा से रोका जा सकता है?: नमाज़ पर कथित रोक को लेकर इलाहाबाद हाईकोर्ट ने यूपी सरकार से पूछा

Update: 2026-03-16 09:09 GMT

इलाहाबाद हाईकोर्ट ने रमज़ान के दौरान नमाज़ पर कथित प्रतिबंध को लेकर उत्तर प्रदेश सरकार से कड़ा सवाल करते हुए पूछा कि यदि मुसलमानों को निजी संपत्ति पर नमाज़ पढ़ने से रोका जा सकता है तो क्या हिंदुओं को भी अपने घरों में सामूहिक पूजा करने से रोका जा सकता है।

जस्टिस अतुल श्रीधरन और जस्टिस सिद्धार्थ नंदन की खंडपीठ संभल जिले में रमज़ान के दौरान नमाज़ पढ़ने पर लगाए गए कथित प्रतिबंध को चुनौती देने वाली याचिका पर सुनवाई कर रही थी।

सुनवाई के दौरान जस्टिस श्रीधरन ने मौखिक टिप्पणी करते हुए कहा,

“मुसलमानों को अपने घर की छत पर नमाज़ पढ़ने से कैसे रोका जा सकता है? कानून का राज सभी नागरिकों के साथ समान व्यवहार की मांग करता है और संविधान सर्वोपरि है।”

अदालत ने राज्य सरकार के एडिशनल एडवोकेट जनरल मनीष गोयल से पूछा कि क्या मंदिरों में भी इस तरह के प्रतिबंध लगाए जाते हैं। अदालत ने कहा कि यदि हिंदू अपने घरों में पूजा कर रहे हों तो क्या उन्हें भी रोका जा सकता है?

खंडपीठ ने स्पष्ट किया कि राज्य केवल तभी हस्तक्षेप कर सकता है, जब धार्मिक गतिविधियां सार्वजनिक सड़क या सार्वजनिक स्थान पर फैलने लगें। यदि प्रार्थना पूरी तरह निजी संपत्ति के भीतर हो रही है तो उसमें हस्तक्षेप का सवाल नहीं उठता।

मामले में याचिकाकर्ता मुनाजिर खान ने आरोप लगाया कि प्रशासन उन्हें उस स्थान पर नमाज़ पढ़ने से रोक रहा है, जिसे वह मस्जिद बताते हैं। हालांकि सुनवाई के दौरान अदालत ने पाया कि याचिका में संपत्ति के क्षेत्रफल और विवरण को लेकर कई विसंगतियां हैं।

अदालत ने यह भी कहा कि याचिकाकर्ता द्वारा पेश किए गए दस्तावेजों में स्थल की वास्तविक तस्वीरें नहीं थीं बल्कि केवल अखबार की कतरनें संलग्न की गई थीं। प्रारंभिक तौर पर अदालत ने माना कि संबंधित स्थल मस्जिद नहीं है।

राज्य सरकार की ओर से भी कहा गया कि राजस्व रिकॉर्ड के अनुसार यह संपत्ति निजी व्यक्तियों के नाम दर्ज है और वहां मस्जिद नहीं बल्कि एक मकान है।

इस पर अदालत ने टिप्पणी की कि वह ढांचा मस्जिद तो नहीं है और शायद मकान भी नहीं बल्कि केवल एक कमरा है।

सुनवाई के दौरान जस्टिस सिद्धार्थ नंदन ने यह भी कहा कि नमाज़ के बाद किसी प्रकार के भड़काऊ भाषण नहीं होने चाहिए और ऐसा करने पर भारतीय न्याय संहिता (BNS) के तहत कार्रवाई हो सकती है।

इससे पहले 27 फरवरी को हाइकोर्ट ने प्रशासन का वह आदेश खारिज किया, जिसमें कथित तौर पर कानून-व्यवस्था के आधार पर उस स्थान पर केवल 20 लोगों को नमाज़ पढ़ने की अनुमति दी गई थी। अदालत ने तब कहा था कि कानून-व्यवस्था बनाए रखना राज्य की जिम्मेदारी है।

अदालत ने सख्त टिप्पणी करते हुए कहा था कि यदि स्थानीय प्रशासन को लगता है कि वह कानून-व्यवस्था संभालने में सक्षम नहीं है तो उसे पद छोड़ देना चाहिए या स्थानांतरण ले लेना चाहिए।

अदालत ने यह भी कहा था कि हर समुदाय को अपने पूजा स्थल या निजी संपत्ति पर शांतिपूर्वक पूजा-अर्चना करने का अधिकार है।

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