उचित समय में मकान न बनाने पर आवासीय पट्टा निरस्त कर सकता है कलेक्टर: इलाहाबाद हाइकोर्ट
इलाहाबाद हाइकोर्ट ने कहा कि यदि आवंटित आवासीय भूखंड पर उचित समय के भीतर मकान का निर्माण नहीं किया जाता है तो कलेक्टर को उत्तर प्रदेश राजस्व संहिता नियमावली 2016 के नियम 64(2)(ख) के तहत पट्टा निरस्त करने का अधिकार है, बशर्ते संबंधित पक्ष को पूर्व सूचना दी गई हो।
जस्टिस आलोक माथुर ने कहा,
“आवासीय भूखंडों के आवंटन संबंधी प्रावधानों को प्रभावी बनाने और उनका पालन सुनिश्चित करने के लिए यह आवश्यक है कि भूमि का उपयोग उचित समय के भीतर मकान निर्माण के लिए किया जाए। यदि किसी कारणवश पट्टाधारी मकान निर्माण नहीं कर पाता है तो उसे निर्धारित समय में निर्माण करने के लिए नोटिस दिया जाना चाहिए। यदि वह निर्धारित समय में भी निर्माण नहीं करता है तो कलेक्टर नियम 64 के उपखंड (2)(ख) के तहत पट्टा निरस्त करने की शक्ति का प्रयोग कर सकता है।”
मामले में निजी प्रतिवादी के पक्ष में पट्टा दिया गया। याचिकाकर्ता ने नियम 66 के तहत शिकायत दायर कर कहा कि पट्टा दिए जाने के तीन वर्ष के भीतर मकान का निर्माण नहीं किया गया। इसलिए नियम 64(2)(ख) के तहत पट्टा निरस्त किया जाना चाहिए।
निजी प्रतिवादी ने शिकायत को अत्यधिक विलंब से दायर बताया। कलेक्टर ने यह तर्क स्वीकार करते हुए शिकायत खारिज की, क्योंकि पट्टा दिए जाने के 32 वर्ष बाद शिकायत की गई थी। इसके विरुद्ध याचिकाकर्ता ने अयोध्या मंडल के अपर आयुक्त (न्यायिक) के समक्ष पुनरीक्षण दायर किया जिसे भी खारिज कर दिया गया। इसके बाद मामला हाइकोर्ट पहुंचा।
अदालत ने कहा कि नियम 64 में प्रावधान है कि यदि तीन वर्ष के भीतर मकान का निर्माण नहीं होता है तो पट्टा 'निरस्त किया जा सकता है'। अदालत ने स्पष्ट किया कि 'किया जा सकता है' शब्द निर्देशात्मक है अनिवार्य नहीं।
अदालत ने यह भी कहा कि धारा 64 के तहत मुख्य रूप से कृषि श्रमिकों सहित समाज के विभिन्न वर्गों को पट्टा स्थल आवंटित किए जाते हैं। इन शक्तियों के दुरुपयोग को रोकने के लिए धारा 66 में अनियमित आवंटन की जांच का प्रावधान है, जिसे कलेक्टर स्वयं संज्ञान लेकर या किसी पीड़ित व्यक्ति के आवेदन पर कर सकता है। हालांकि धारा 66(2) में यह भी स्पष्ट है कि आवंटन की तिथि से तीन वर्ष के बाद किया गया आवेदन स्वीकार नहीं किया जाएगा।
अदालत ने यह माना कि कोई पीड़ित व्यक्ति आवंटन की तिथि से तीन वर्ष के भीतर ही आवेदन कर सकता है, लेकिन कलेक्टर स्वयं संज्ञान लेकर उचित समयावधि में तीन वर्ष से अधिक समय बीत जाने के बाद भी पट्टा निरस्त कर सकता है।
चूंकि याचिकाकर्ता स्वयं को पीड़ित व्यक्ति बता रहा था, इसलिए उसे तीन वर्ष के भीतर आवेदन करना चाहिए था। 32 वर्ष बाद दायर आवेदन अत्यधिक विलंबित था। इस आधार पर हाइकोर्ट ने याचिकाकर्ता का दावा खारिज करने का आदेश सही ठहराया।