लखनऊ में ही 50 हजार फाइनल रिपोर्टें लंबित, पीठासीन अधिकारियों की उदासीनता पर इलाहाबाद हाईकोर्ट सख्त; पूरे प्रदेश से मांगी रिपोर्ट
इलाहाबाद हाईकोर्ट ने उत्तर प्रदेश की जिला अदालतों में आपराधिक मामलों की फाइनल रिपोर्टों के वर्षों तक लंबित रहने पर गंभीर चिंता जताई। अदालत ने कहा कि अकेले लखनऊ जजी में ही लगभग 50 हजार फाइनल रिपोर्टें आदेश की प्रतीक्षा में लंबित हैं, जो आपराधिक न्याय व्यवस्था के लिए बेहद चिंताजनक स्थिति है।
जस्टिस तेज प्रताप तिवारी की एकल पीठ ने पूरे प्रदेश के सभी जिला एवं सेशन जजों से फाइनल रिपोर्टों की लंबित संख्या और उनके निस्तारण के लिए उठाए गए कदमों का विस्तृत ब्यौरा तलब किया।
अदालत भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता (BNSS) की धारा 529 के तहत दायर दो कारोबारियों की याचिका पर सुनवाई कर रही थी। याचिकाकर्ताओं का कहना था कि उनके खिलाफ जालसाजी और आपराधिक न्यासभंग के मामले में पुलिस ने जुलाई 2020 में फाइनल रिपोर्ट दाखिल की थी। शिकायतकर्ता को नोटिस भी जारी हो चुका है लेकिन आज तक अदालत ने उस पर कोई अंतिम आदेश पारित नहीं किया।
याचिकाकर्ताओं ने बताया कि मामले के लंबित रहने के कारण उनके पासपोर्ट का नवीनीकरण प्रभावित हो रहा है और विदेश यात्रा में भी कठिनाई आ रही है। उन्होंने यह भी कहा कि पहले हाईकोर्ट ने निचली अदालत को मामले का शीघ्र निस्तारण करने का निर्देश दिया लेकिन इसके बावजूद कोई आदेश पारित नहीं हुआ।
मामले पर सुनवाई करते हुए हाईकोर्ट ने कहा कि यह समस्या केवल इस एक मामले तक सीमित नहीं है।
अदालत ने कहा,
"यह अत्यंत गंभीर चिंता का विषय है कि जिला अदालतों में दाखिल फाइनल रिपोर्टें लंबे समय तक लंबित रखी जा रही हैं। अकेले लखनऊ न्यायाधीशी में ही लगभग 50 हजार फाइनल रिपोर्टें आदेश की प्रतीक्षा में लंबित हैं।"
खंडपीठ ने कहा कि फाइनल रिपोर्ट दाखिल होने के बाद शिकायतकर्ता को नोटिस जारी किया जाना आवश्यक है, लेकिन केवल नोटिस की तामील न होने के कारण वर्षों तक मामला लंबित रखना समझ से परे है। इसका सबसे अधिक नुकसान उन आरोपियों को होता है जिनके संबंध में फाइनल रिपोर्ट दाखिल की जा चुकी होती है।
अदालत ने यह भी कहा कि ऐसी स्थिति केवल लखनऊ तक सीमित नहीं है बल्कि प्रदेश के अन्य जिलों में भी फाइनल रिपोर्टों का भारी लंबित बोझ है।
हाईकोर्ट ने कड़ी टिप्पणी करते हुए कहा कि इन मामलों के वर्षों तक लंबित रहने के लिए पक्षकार नहीं, बल्कि पीठासीन अधिकारियों की उदासीनता जिम्मेदार है।
अदालत ने कहा,
"एक बार फाइनल रिपोर्ट संबंधित अदालत में दाखिल हो जाने के बाद उसका निस्तारण करना सबसे पहले उसी अदालत के पीठासीन अधिकारी की जिम्मेदारी होती है। दुर्भाग्य से यही वह क्षेत्र है जहां व्यवस्था समय पर न्याय देने में विफल रही है।"
अदालत ने स्पष्ट किया कि विवादित मामलों का जल्दबाजी में निस्तारण नहीं किया जा सकता लेकिन जांच पूरी होने के बाद दाखिल फाइनल रिपोर्टों को वर्षों तक लंबित रखना किसी भी दृष्टि से उचित नहीं है।
हाईकोर्ट ने कहा कि यद्यपि दंड प्रक्रिया संहिता (IPC) और BNSS में फाइनल रिपोर्ट के निस्तारण की कोई निश्चित समय-सीमा निर्धारित नहीं है फिर भी इस प्रकार की अत्यधिक देरी स्वीकार नहीं की जा सकती।
अदालत ने रजिस्ट्रार जनरल के माध्यम से प्रदेश के सभी जिला एवं सेशन जजों को निर्देश दिया कि वे अपने अधीनस्थ न्यायालयों में लंबित फाइनल रिपोर्टों की नियमित समीक्षा करें और विशेष रूप से उन मामलों को प्राथमिकता दें, जिनमें शिकायतकर्ता या सूचनाकर्ता को नोटिस जारी किया जा चुका है।
साथ ही मुख्य न्यायिक मजिस्ट्रेटों और अन्य मजिस्ट्रेटों को भी लंबित फाइनल रिपोर्टों का शीघ्र निस्तारण सुनिश्चित करने के लिए गंभीर प्रयास करने के निर्देश दिए गए।
हाईकोर्ट ने प्रदेश के सभी जिला एवं सेशन जजों से यह जानकारी भी मांगी कि उनके जिले में अदालतवार कितनी फाइनल रिपोर्टें लंबित हैं, उनके निस्तारण में देरी के कारण क्या हैं, लंबित मामलों के निस्तारण के लिए अब तक क्या कदम उठाए गए और भविष्य के लिए क्या कार्ययोजना बनाई गई।
मामले की अगली सुनवाई 20 अगस्त 2026 को होगी, जब प्रदेशभर से प्राप्त रिपोर्टों पर विचार किया जाएगा।