UP STF IG पर रिश्वत लेकर अपराधी छोड़ने के आरोप वाली खबर मामले में न्यूज़18 के पत्रकारों को हाइकोर्ट से राहत नहीं

Update: 2026-01-30 08:24 GMT

इलाहाबाद हाइकोर्ट की लखनऊ बेंच ने न्यूज़18 चैनल के एग्जीक्यूटिव एडिटर और अन्य पत्रकारों द्वारा दायर याचिका खारिज की, जिसमें उनके खिलाफ जारी समन आदेश को चुनौती दी गई थी। यह समन सीनियर आईपीएस अधिकारी अमिताभ यश द्वारा दायर आपराधिक मानहानि के मामले में जारी किया गया।

जस्टिस ब्रिज राज सिंह की पीठ ने कहा कि दंड प्रक्रिया संहिता (CrPC) की धारा 482 के तहत दाखिल याचिका पर सुनवाई करते समय हाइकोर्ट “मिनी ट्रायल” नहीं कर सकता और न ही इस स्तर पर पत्रकारों की निर्दोषता से संबंधित साक्ष्यों का मूल्यांकन किया जा सकता है।

\मामला 20 सितंबर, 2017 को न्यूज़18 पंजाब/हरियाणा/हिमाचल प्रदेश चैनल पर प्रसारित एक समाचार कार्यक्रम से जुड़ा है, जिसमें यह दावा किया गया कि नाभा जेल ब्रेक कांड के मास्टरमाइंड गुरप्रीत सिंह उर्फ गोपी घनश्यामपुरिया को उत्तर प्रदेश पुलिस ने गिरफ्तार किया, लेकिन बाद में यूपी एसटीएफ के तत्कालीन आईजी अमिताभ यश ने कथित रूप से पैसे लेकर उसे छोड़ दिया।

अमिताभ यश वर्तमान में उत्तर प्रदेश में एडीजी (एसटीएफ एवं कानून-व्यवस्था) के पद पर कार्यरत हैं। उन्होंने अपनी शिकायत में कहा कि उक्त प्रसारण में एंकर द्वारा बार-बार यह पंक्ति दोहराई गई एसटीएफ के आईजी अमिताभ यश पैसा लेकर पंजाब के आतंकियों को छोड़ देता है।” उनके अनुसार, इस प्रसारण से उनकी छवि को गंभीर क्षति पहुंचीbजबकि एक उच्चस्तरीय सरकारी जांच समिति ने बाद में उन्हें सभी आरोपों से मुक्त कर दिया।

शिकायत पर संज्ञान लेते हुए अपर मुख्य न्यायिक मजिस्ट्रेट कोर्ट संख्या 32, लखनऊ ने 12 दिसंबर 2018 को न्यूज़18 पंजाब की तत्कालीन एडिटर ज्योति कमल, रिपोर्टर संतोष शर्मा और एंकर गौरव शुक्ला को समन जारी किया।

समन को चुनौती देते हुए पत्रकारों की ओर से यह दलील दी गई कि उक्त खबर कई राष्ट्रीय समाचार पत्रों में भी प्रकाशित हुई और चैनल ने निष्पक्ष, ईमानदार एवं तथ्यात्मक रिपोर्टिंग की थी। यह भी कहा गया कि प्रसारण में अमिताभ यश पर किसी अपराधी को छोड़ने का सीधा आरोप नहीं लगाया गया और विभागीय जांच में उन्हें क्लीन चिट मिल चुकी है, इसलिए आपराधिक कार्यवाही को रद्द किया जाना चाहिए।

वहीं अमिताभ यश की ओर से पेश वकील ने दलील दी कि समाचार के प्रसारण से इनकार नहीं किया गया और लगाए गए आरोप मानहानि के दायरे में आते हैं। उन्होंने यह भी बताया कि इसी मामले में अन्य चैनलों से जुड़े आरोपियों को पहले ही राहत नहीं दी जा चुकी है और एक समान मामले में सुप्रीम कोर्ट ने भी हाइकोर्ट के राहत आदेश को मार्च 2024 में निरस्त कर दिया था।

इन तथ्यों को ध्यान में रखते हुए हाइकोर्ट ने कहा कि मजिस्ट्रेट द्वारा धारा 200 और 202 के तहत बयान दर्ज करने के बाद ही समन जारी किया गया और यह आरोप है कि प्रसारण से शिकायतकर्ता की छवि समाज में धूमिल हुई। ऐसे में साक्ष्यों का मूल्यांकन केवल ट्रायल के दौरान ही किया जा सकता है।

अदालत ने यह कहते हुए याचिका खारिज कर दी कि इस स्तर पर कार्यवाही में हस्तक्षेप का कोई आधार नहीं बनता।

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