सरकारी कल्याण योजना के तहत लाभार्थी को दिए गए मुआवज़े को चुनौती देने के लिए इंश्योरेंस कंपनी रिट याचिका दायर नहीं कर सकती: इलाहाबाद हाईकोर्ट

Update: 2026-08-04 14:09 GMT

इलाहाबाद हाईकोर्ट ने कहा कि इंश्योरेंस कंपनी, राज्य सरकार और इंश्योरेंस कंपनी के बीच हुए समझौते (MoU) के कथित उल्लंघन का हवाला देकर, सरकारी कल्याण योजना के तहत लाभार्थी को दिए गए मुआवज़े को चुनौती देने के लिए संविधान के अनुच्छेद 226 के तहत रिट अधिकार क्षेत्र का इस्तेमाल नहीं कर सकती।

कोर्ट ने कहा कि ऐसा विवाद मूल रूप से अनुबंध (Contract) से जुड़ा है और इसे उचित सिविल, कमर्शियल या आर्बिट्रेशन फोरम के सामने उठाया जाना चाहिए।

कोर्ट ने देखा कि योजना के लाभार्थी MoU का हिस्सा नहीं हैं और उन्हें इंश्योरेंस कंपनी और राज्य के बीच अनुबंध संबंधी दायित्वों से उत्पन्न विवादों का बचाव करने के लिए मजबूर नहीं किया जा सकता।

जस्टिस सरल श्रीवास्तव और जस्टिस गरिमा प्रसाद की बेंच ने कहा,

"अनुच्छेद 226 के तहत असाधारण अधिकार क्षेत्र को इंश्योरेंस कंपनियों के लिए कल्याणकारी योजनाओं के तहत मुआवज़े के निर्धारण को चुनौती देने का एक सामान्य उपाय नहीं बनने दिया जा सकता, सिर्फ़ राज्य सरकार के साथ हुए समझौते (MoU) के उल्लंघन का आरोप लगाकर। ऐसी याचिकाओं पर विचार करने से रिट अधिकार क्षेत्र, इंश्योरेंस कंपनी और राज्य सरकार के बीच अनुबंध संबंधी विवादों के निपटारे के लिए एक समानांतर अपीलीय मंच में बदल जाएगा, जिससे योजना का उद्देश्य ही विफल हो जाएगा।"

यह मामला तब शुरू हुआ, जब प्रतिवादी नंबर 1 के पति की 29 नवंबर, 2018 को सड़क दुर्घटना में मौत हो गई। उन्होंने 'मुख्यमंत्री किसान एवं सर्वहित बीमा योजना' के तहत मुआवज़े की मांग की, लेकिन इंश्योरेंस कंपनी ने योजना के तहत समय-सीमा (time-barred) का हवाला देते हुए दावा खारिज किया।

हाईकोर्ट द्वारा पिछली कार्यवाही में दिए गए निर्देशों के बाद कानपुर नगर के ज़िला मजिस्ट्रेट ने मामले पर पुनर्विचार किया और 29 नवंबर, 2025 के आदेश द्वारा विधवा को ₹5 लाख का भुगतान करने का निर्देश दिया।

इंश्योरेंस कंपनी ने इस आदेश को मौजूदा रिट याचिका में इस आधार पर चुनौती दी कि योजना राज्य सरकार के साथ हस्ताक्षरित MoU की शर्तों से शासित होती है, और ज़िला मजिस्ट्रेट उन शर्तों से बाहर जाकर मुआवज़ा नहीं दे सकते थे। कंपनी ने यह भी तर्क दिया कि योजना के तहत देर से किए गए दावों और समय-सीमा (limitation) का सवाल, जिस पर हाईकोर्ट की डिवीजन बेंच ने 'गौतम यादव बनाम यूपी राज्य' मामले में फैसला सुनाया, वह सुप्रीम कोर्ट के समक्ष लंबित है और उस फैसले के अमल पर रोक लगा दी गई है।

रिट याचिका के स्वीकार्य होने के सवाल पर कोर्ट ने कहा कि 'मुख्यमंत्री किसान एवं सर्वहित बीमा योजना' प्राइवेट पार्टियों के बीच कोई आम कमर्शियल इंश्योरेंस नहीं है, बल्कि यह राज्य द्वारा गरीब किसानों और उनसे जुड़े कामों में लगे लोगों को तुरंत आर्थिक मदद देने के लिए बनाया गया एक कल्याणकारी उपाय है। यह मदद तब दी जाती है जब परिवार के एकमात्र कमाने वाले सदस्य की मौत हो जाती है या किसी दुर्घटना में वह विकलांग हो जाता है।

आगे कहा गया,

"इस योजना के तहत लाभ पाने वाले लोग न तो 'मेमोरेंडम ऑफ अंडरस्टैंडिंग' (समझौता ज्ञापन) का हिस्सा हैं और न ही याचिकाकर्ता और राज्य सरकार के बीच हुए कॉन्ट्रैक्ट (अनुबंध) का। उनका अधिकार राज्य द्वारा बनाई गई कल्याणकारी योजना से मिलता है, न कि याचिकाकर्ता और राज्य सरकार के बीच आपसी कॉन्ट्रैक्ट से जुड़े अधिकारों और दायित्वों से।"

सरकारी योजना के तहत कल्याणकारी अधिकार को लागू करने के दावे और इंश्योरेंस कंपनी व राज्य के बीच कॉन्ट्रैक्ट से जुड़ी देनदारी के विवाद के बीच अंतर करते हुए, कोर्ट ने कहा कि लाभार्थी अनुच्छेद 226 के तहत 'मैन्डमस' (आदेश) की मांग कर सकता है, लेकिन इंश्योरेंस कंपनी की स्थिति अलग है; वह कोई कानूनी या संवैधानिक अधिकार नहीं जता रही है, बल्कि केवल 'मेमोरेंडम ऑफ अंडरस्टैंडिंग' की शर्तों—जैसे समय-सीमा, दावा प्रक्रिया और देनदारी का बंटवारा—को लागू करवाना चाहती है।

कोर्ट ने 'स्टेट ऑफ बिहार बनाम जैन प्लास्टिक्स एंड केमिकल्स लिमिटेड', 'केरल स्टेट इलेक्ट्रिसिटी बोर्ड बनाम कुरियन ई. कलाथिल' और 'जोशी टेक्नोलॉजीज इंटरनेशनल इंक. बनाम यूनियन ऑफ इंडिया' मामलों का हवाला दिया। इन मामलों में सुप्रीम कोर्ट ने कहा था कि कॉन्ट्रैक्ट की व्याख्या, उसे लागू करने और उसके उल्लंघन से जुड़े विवाद प्राइवेट कानून के दायरे में आते हैं। इन्हें सिविल, कमर्शियल या आर्बिट्रेशन फोरम के सामने रखा जाना चाहिए।

गौतम यादव मामले से जुड़ी कार्यवाही के लंबित होने से भी इंश्योरेंस कंपनी को कोई मदद नहीं मिली। कोर्ट ने गौर किया कि उस मामले में डिवीजन बेंच ने योजना के तहत तय समय-सीमा को मनमाना और अनुचित माना था और निर्देश दिया कि मौत या दावे के खारिज होने के तीन साल के भीतर किए गए दावों को समय के भीतर माना जाए। इस फैसले ने योजना की एक सामान्य शर्त को बदल दिया था और इसका सीधा असर इंश्योरेंस कंपनी की देनदारियों पर पड़ा था। कोर्ट ने कहा कि मौजूदा मामले में ऐसे कोई सवाल शामिल नहीं हैं।

अगर ऐसी याचिकाओं पर सुनवाई की जाती तो क्या होता, इस बारे में बताते हुए कोर्ट ने कहा,

“गरीब किसान, विधवाएं और परिवार के आश्रित सदस्य, जो पहले से ही परिवार के एकमात्र कमाने वाले सदस्य की अचानक मौत से टूट चुके हैं, उन्हें बीमा कंपनी द्वारा शुरू की गई कानूनी कार्यवाही का सामना करने के लिए एक अदालत से दूसरी अदालत भागने के लिए मजबूर होना पड़ेगा, सिर्फ इसलिए कि बीमा कंपनी राज्य सरकार के प्रति अपनी अनुबंध संबंधी देनदारियों पर विवाद कर रही है। तत्काल वित्तीय राहत के लिए दिए जाने वाले कल्याणकारी मुआवजे को तब तक अनिश्चित काल के लिए नहीं रोका जा सकता जब तक कि बीमा कंपनी सरकार के साथ अपने समझौते के हर अनुबंध या प्रक्रियात्मक पहलू से पूरी तरह संतुष्ट न हो जाए।”

याचिका को सुनवाई योग्य न मानते हुए अदालत ने कहा कि उसे मामले के गुण-दोष के आधार पर हस्तक्षेप करने का कोई कारण नहीं मिला। जिला मजिस्ट्रेट ने स्पष्ट रूप से पाया था कि दावा निर्धारित समय सीमा के भीतर दायर किया गया और प्रतिवादी नंबर 1 मुआवजे का हकदार था। इसमें कोई मनमानी, अधिकार क्षेत्र की गलती या स्पष्ट गैर-कानूनी बात नहीं पाई गई। एक बार जब सक्षम प्राधिकारी ने दावे पर निर्णय ले लिया तो अदालत ने माना कि बीमा कंपनी समझौता ज्ञापन (MoU) की अपनी व्याख्या के आधार पर भुगतान करने से इनकार नहीं कर सकती।

कोर्ट ने कहा,

“इसके विपरीत मानने का मतलब होगा कि बीमा कंपनी को योजना के तहत जिला मजिस्ट्रेट द्वारा किए गए हर निर्णय के खिलाफ अपील करने की अनुमति देना, जो न तो योजना के तहत और न ही पार्टियों को नियंत्रित करने वाले अनुबंध ढांचे के तहत सोचा गया था।”

यह देखते हुए कि 29 नवंबर 2025 के आदेश के बाद से मुआवजा नहीं दिया गया, अदालत ने कहा कि ऐसी देरी योजना के उद्देश्य के खिलाफ है। अदालत ने रिट याचिका खारिज की और बीमा कंपनी को तीन महीने के भीतर मुआवजा जारी करने का निर्देश दिया, साथ ही उसे राज्य सरकार के खिलाफ अपनी अनुबंध संबंधी शिकायतों को उचित मंच पर उठाने की छूट भी दी।

Case Title: The Oriental Insurance Company Limited vs. Smt Rachna Singh and 2 others 2026 LiveLaw (AB) 525

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