हत्या के मामले में गले की हायॉइड हड्डी का टूटना जरूरी नहीं: इलाहाबाद हाईकोर्ट, पति को जमानत देने से किया इनकार
इलाहाबाद हाईकोर्ट ने अहम फैसले में कहा कि गला दबाकर हत्या के मामलों में हायॉइड हड्डी (गर्दन की छोटी यू-आकार की हड्डी) का टूटना अनिवार्य नहीं है। अदालत ने यह भी स्पष्ट किया कि गवाहों के बयान दर्ज करने में देरी हमेशा अभियोजन के खिलाफ नहीं जाती, यदि उसके पीछे उचित कारण हो।
जस्टिस अरुण कुमार सिंह देशवाल की पीठ ने पत्नी की गला दबाकर हत्या के आरोपी पति की जमानत याचिका खारिज करते हुए ये टिप्पणियां कीं।
सुनवाई के दौरान आरोपी पक्ष ने दलील दी थी कि पोस्टमार्टम रिपोर्ट में गला दबाने की बात कही गई, लेकिन मृतका की हायॉइड हड्डी नहीं टूटी थी, जिससे हत्या का दावा संदिग्ध होता है। इसके अलावा, गवाहों—मृतका की बेटी और भतीजे के बयान काफी देर से दर्ज किए गए।
हालांकि, राज्य और शिकायतकर्ता पक्ष ने इसका विरोध करते हुए कहा कि पोस्टमार्टम रिपोर्ट में अन्य चोटों का भी उल्लेख है, जो संघर्ष का संकेत देती हैं। साथ ही बच्चों के बयान में देरी का कारण उनकी मानसिक स्थिति और सदमा बताया गया।
हाईकोर्ट ने मेडिकल बुक्स और सुप्रीम कोर्ट के पूर्व फैसलों का हवाला देते हुए कहा कि कम उम्र के पीड़ितों में हायॉइड हड्डी का न टूटना संभव है। इसलिए केवल इस आधार पर गला दबाने की घटना को नकारा नहीं जा सकता।
अदालत ने कहा,
“हायॉइड हड्डी का फ्रैक्चर हर मामले में जरूरी नहीं है। कई मामलों में बिना फ्रैक्चर के भी गला दबाकर हत्या हो सकती है।”
गवाहों के बयान में देरी पर अदालत ने कहा कि यदि इसके पीछे उचित कारण है तो इससे पूरे मामले को कमजोर नहीं माना जा सकता। इस मामले में बच्चों का सदमे में होना देरी का उचित कारण माना गया।
मामले के तथ्यों पर विचार करते हुए अदालत ने पाया कि पोस्टमार्टम में गला दबाने की पुष्टि हुई और शरीर पर संघर्ष के निशान भी मौजूद हैं। साथ ही गवाहों के अनुसार घटना के समय आरोपी घर में मौजूद था।
अदालत ने कहा कि ऐसे मामलों में आरोपी पर यह जिम्मेदारी होती है कि वह घटना की परिस्थितियों की संतोषजनक व्याख्या करे। हालांकि, आरोपी ऐसा करने में विफल रहा और केवल अपनी मौजूदगी से इनकार करता रहा।
इन सभी आधारों पर हाईकोर्ट ने जमानत देने से इनकार करते हुए याचिका खारिज की।