क्रूरता/उत्पीड़न से कोई सीधा संबंध न होने तक 'दहेज हत्या' का अपराध सिर्फ़ कीमती चीज़ों की मांग करने पर लागू नहीं होता: इलाहाबाद हाईकोर्ट
इलाहाबाद हाईकोर्ट ने यह टिप्पणी की कि IPC की धारा 304-B (दहेज हत्या) के तहत अपराध साबित करने के लिए पीड़िता की मौत और दहेज से जुड़े उत्पीड़न या क्रूरता के बीच 'स्पष्ट संबंध' होना ज़रूरी है।
जस्टिस मनीष माथुर की बेंच ने आगे कहा कि जहाँ सिर्फ़ चीज़ों या कीमती सामान की मांग का किसी ऐसे उत्पीड़न या क्रूरता से कोई संबंध न हो, जिसके कारण मौत हुई हो, वहां IPC की धारा 304-B और धारा 498-A (साक्ष्य अधिनियम की धारा 113-B के साथ पढ़ी जाने पर) के प्रावधान लागू नहीं होंगे।
इस तरह बेंच ने मेवा लाल और पीड़िता के दो अन्य ससुराल वालों द्वारा दायर आपराधिक अपील को मंज़ूरी दी। इन लोगों को ट्रायल कोर्ट ने 2004 में IPC की धारा 304B, 498A और दहेज निषेध अधिनियम, 1961 की धारा 3/4 के तहत दोषी ठहराया था।
संक्षेप में मामला
संक्षेप में कहें तो, आरोप यह था कि अपीलकर्ताओं ने दहेज की माँग पूरी न होने के कारण पीड़िता को ज़हर देकर मार डाला।
हाईकोर्ट के सामने अपीलकर्ता-आरोपियों ने यह दलील दी कि जिन अपराधों के तहत उन पर आरोप लगाए गए, उनके ज़रूरी तत्व (Ingredients) पूरे नहीं होते। साथ ही मृतक के शरीर पर कोई चोट नहीं मिली और न ही विसरा रिपोर्ट में किसी ज़हर का पता चला था।
अपीलकर्ताओं की मुख्य दलील यह थी कि क्रूरता या अप्राकृतिक मौत का कोई सबूत नहीं है।
दूसरी ओर, राज्य सरकार ने यह तर्क दिया कि हालांकि मृतक के शरीर पर कोई चोट नहीं मिली थी, लेकिन अभियोजन पक्ष के तीनों गवाहों के बयानों से यह बात साफ़ तौर पर साबित होती है कि उत्पीड़न और क्रूरता हुई, जिसके कारण पीड़िता की मौत उसके मायके जाने के तुरंत बाद हो गई।
हाईकोर्ट का आदेश
इन दलीलों को ध्यान में रखते हुए बेंच ने यह पाया कि हालाँकि शादी के सात साल के अंदर ही मौत हो गई, लेकिन पोस्टमॉर्टम रिपोर्ट में शरीर पर किसी भी बाहरी चोट का कोई ज़िक्र नहीं था।
बेंच ने यह भी पाया कि विसरा रिपोर्ट (जिसकी जांच ट्रायल कोर्ट ने भी की थी) में ज़हर देने के कारण मौत होने का कोई संकेत नहीं था। जांच करने वाले डॉक्टर ने यह राय दी थी कि मौत का सही कारण पता नहीं लगाया जा सका। हाईकोर्ट ने बताया कि ट्रायल कोर्ट ने अपीलकर्ताओं के खिलाफ दोष की धारणा गलत तरीके से दर्ज की थी, जिसका आधार केवल दो बातें थीं: एक तो यह कि मौत सात साल के भीतर हुई, और दूसरी यह कि परिवार के सदस्यों की गवाहियाँ बिना किसी ठोस सबूत के थीं।
इस पृष्ठभूमि में कोर्ट ने IPC की धारा 304-B की जांच की और पाया कि इस अपराध को लागू करने के लिए यह ज़रूरी है कि यह तथ्य सबूतों से साबित हो जाए कि किसी महिला की मौत जलने, शारीरिक चोट लगने, या सामान्य परिस्थितियों से हटकर किसी अन्य कारण से हुई।
बेंच ने कहा कि ऐसे सभी मामले जिनमें मौत का कारण पता नहीं चल पाता, वे अपने आप 'अप्राकृतिक मौत' के दायरे में नहीं आ जाएंगे; यह साबित करने के लिए कि मौत किसी ऐसे कारण से हुई, जो प्राकृतिक नहीं था, "कम-से-कम थोड़ा-सा भी सबूत" होना ज़रूरी है।
इस संबंध में कोर्ट ने आगे कहा कि मौत "सामान्य परिस्थितियों से हटकर" हुई—इस बात को साबित करने वाले ज़रूरी तत्व न तो किसी मेडिकल रिपोर्ट से, न परिवार के सदस्यों की गवाही से, और न ही पोस्टमॉर्टम रिपोर्ट से (जिसकी पुष्टि जांच करने वाले डॉक्टर ने की हो) साबित हो पाए।
इसलिए ऐसी परिस्थितियों में कोर्ट ने यह फैसला दिया कि मौत सामान्य परिस्थितियों से हटकर नहीं हुई।
जहां तक मृतक के साथ क्रूरता या उत्पीड़न किए जाने की बात है, बेंच ने राय दी कि IPC की धारा 304-B और 498-A के तहत अपराधों को लागू करने के लिए, मौत और दहेज से जुड़े उत्पीड़न या उस पर की गई क्रूरता के बीच एक "स्पष्ट संबंध" होना चाहिए।
मामले के तथ्यों को ध्यान में रखते हुए बेंच ने पाया कि पिता के अपने बयान से ही यह पता चलता है कि अपनी आखिरी मुलाकात (जो मौत से ठीक तीन दिन पहले हुई थी) के बाद वह खुशी-खुशी विदा हुई, और अपनी मौत से ठीक तीन महीने पहले ही उसने एक बेटी को जन्म दिया।
बेंच ने आगे कहा कि हालांकि अपीलकर्ता नंबर 1 ने कीमती चीज़ों की मांग की थी, लेकिन इस मांग को मौत से जुड़ा हुआ नहीं माना जा सकता। ऐसा इसलिए है, क्योंकि "इस मांग और मृतक के साथ हुई किसी ऐसी खास क्रूरता या उत्पीड़न के मामले के बीच कोई संबंध नज़र नहीं आता, जिसके परिणामस्वरूप उसकी मौत हुई हो"।
इसे देखते हुए ट्रायल कोर्ट के तर्क को रिकॉर्ड पर मौजूद सामग्री के विपरीत और गलत मानते हुए बेंच ने दोषसिद्धि रद्द की और आरोपी-अपीलकर्ताओं को बरी किया।
Case title - Mewa Lal And 2 Ors. vs State of U.P. 2026 LiveLaw (AB) 205