DGP सर्कुलर से अनभिज्ञता कोई बहाना नहीं: इलाहाबाद हाइकोर्ट ने गिरफ्तारी को अवैध ठहराया, कहा- गिरफ्तारी के आधार न बताना कानून का उल्लंघन

Update: 2026-02-10 08:08 GMT

इलाहाबाद हाइकोर्ट ने पुलिस की कार्यप्रणाली पर कड़ी टिप्पणी करते हुए कहा कि DGP द्वारा जारी सर्कुलर से अनभिज्ञता कानून के उल्लंघन का कोई वैध बहाना नहीं हो सकती।

इसके साथ ही कोर्ट ने गिरफ्तारी के आधार बताए बिना दो व्यक्तियों को हिरासत में लिए जाने को अदालत ने अवैध करार देते हुए उनकी तत्काल रिहाई का आदेश दिया।

जस्टिस सिद्धार्थ और जस्टिस जय कृष्ण उपाध्याय की खंडपीठ ने मैनपुरी के दो याचिकाकर्ताओं अनूप कुमार और एक अन्य द्वारा दायर बंदी प्रत्यक्षीकरण (हैबियस कॉर्पस) याचिका स्वीकार करते हुए न केवल उनकी गिरफ्तारी को अवैध घोषित किया, बल्कि मुख्य न्यायिक मजिस्ट्रेट, मैनपुरी द्वारा पारित रिमांड आदेश को भी रद्द कर दिया।

मामले में याचिकाकर्ताओं की ओर से वकील राघव देव गर्ग ने दलील दी कि दोनों को गिरफ्तार करते समय उन्हें गिरफ्तारी के आधारों की जानकारी नहीं दी गई, जो कि कानून और संवैधानिक अधिकारों का स्पष्ट उल्लंघन है।

उन्होंने बताया कि 3 फरवरी, 2026 को पुलिस महानिदेशक द्वारा एक सर्कुलर जारी किया गया, जो उमंग रस्तोगी मामले में हाइकोर्ट के निर्णय के अनुपालन में था और उत्तर प्रदेश में सभी गिरफ्तारियां करने वाले पुलिस अधिकारियों पर लागू होता है।

सुनवाई के दौरान राज्य सरकार की ओर से अपर सरकारी एडवोकेट प्रेम शंकर प्रसाद ने यह तर्क दिया कि मैनपुरी के संबंधित थानाध्यक्ष को जुलाई, 2025 में जारी डीजीपी सर्कुलर की जानकारी नहीं थी जिसमें गिरफ्तारी के नए मेमोरेंडम का प्रावधान किया गया। राज्य का कहना था कि जानकारी के अभाव में अधिकारी से यह चूक हुई।

हालांकि हाइकोर्ट ने इस दलील को सिरे से खारिज कर दिया। पीठ ने स्पष्ट कहा कि कानून से अनभिज्ञता किसी भी अधिकारी को कानून तोड़ने का अधिकार नहीं देती।

अदालत ने कहा कि DGP का सर्कुलर और सुप्रीम कोर्ट तथा हाइकोर्ट द्वारा निर्धारित कानूनी दिशा-निर्देशों का पालन करना अनिवार्य है।

हाइकोर्ट ने अपने आदेश में यह भी कहा कि गिरफ्तारी न केवल डीजीपी सर्कुलर के विरुद्ध थी बल्कि सुप्रीम कोर्ट के मिहिर राजेश बनाम महाराष्ट्र राज्य और इलाहाबाद हाइकोर्ट के उमंग रस्तोगी बनाम उत्तर प्रदेश राज्य के फैसलों के भी खिलाफ थी, जिनमें गिरफ्तारी के समय आधार बताना अनिवार्य करार दिया गया।

इन परिस्थितियों में अदालत ने याचिकाकर्ताओं की गिरफ्तारी को अवैध ठहराते हुए उनकी तत्काल रिहाई का आदेश दिया। हालांकि अदालत ने यह भी स्पष्ट किया कि यदि कानून के अनुसार कोई कार्रवाई बनती है तो संबंधित अधिकारी भविष्य में विधि के अनुरूप कदम उठाने के लिए स्वतंत्र होंगे।

यह फैसला पुलिस अधिकारियों को कानून के प्रति जवाबदेह बनाए रखने और व्यक्तिगत स्वतंत्रता की रक्षा की दिशा में एक अहम संदेश माना जा रहा है।

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