इलाहाबाद हाईकोर्ट का महत्वपूर्ण फैसला: धोखाधड़ी और आपराधिक न्यासभंग साथ-साथ लग सकते हैं

Update: 2026-04-06 08:22 GMT

इलाहाबाद हाईकोर्ट ने स्पष्ट किया कि एक ही मामले में 'धोखाधड़ी' और 'आपराधिक न्यासभंग' जैसे अपराध एक साथ लगाए जा सकते हैं, यदि परिस्थितियों से यह स्पष्ट न हो कि वास्तव में कौन सा अपराध बना है।

जस्टिस अरुण कुमार सिंह देशवाल की पीठ ने यह महत्वपूर्ण टिप्पणी करते हुए आरोपी की जमानत याचिका खारिज की, जिस पर स्वयं सहायता समूह की गरीब महिलाओं से पैसा लेकर हड़पने का आरोप था।

अदालत के सामने मुख्य सवाल यह था कि क्या भारतीय दंड संहिता (IPC) की धारा 420 (धोखाधड़ी) और धारा 406 (आपराधिक न्यासभंग) को एक साथ लगाने से FIR या पूरी कार्यवाही अवैध हो जाती है।

इस पर विचार करते हुए कोर्ट ने दंड प्रक्रिया संहिता (CrPC) की धारा 221 (अब भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता की धारा 244) का हवाला दिया। इस प्रावधान के अनुसार यदि किसी कृत्य या घटनाक्रम से यह संदेह हो कि कौन-सा अपराध बनता है तो आरोपी पर एक साथ कई धाराएं लगाई जा सकती हैं।

अदालत ने स्पष्ट कहा,

“यदि किसी घटना के तथ्यों से यह स्पष्ट न हो कि कौन सा अपराध बना है तो आरोपी पर धोखाधड़ी और आपराधिक न्यासभंग दोनों के आरोप लगाए जा सकते हैं। इसमें कोई कानूनी बाधा नहीं है।”

आरोपी की ओर से सुप्रीम कोर्ट के फैसले का हवाला देते हुए तर्क दिया गया कि दोनों अपराध एक साथ लागू नहीं हो सकते। हालांकि, हाईकोर्ट ने कहा कि उस फैसले में यह नहीं कहा गया कि दोनों धाराएं लगाने पर कार्यवाही ही अवैध हो जाएगी।

मामले के तथ्यों पर गौर करते हुए कोर्ट ने पाया कि आरोपी ने 33 महिलाओं से लगभग 2.11 लाख रुपये एक कंपनी के नाम पर जमा किए लेकिन राशि जमा नहीं की। यहां तक कि उसने पहले पैसा लौटाने का आश्वासन दिया लेकिन बाद में मुकर गया।

अदालत ने यह भी नोट किया कि कई पीड़ित महिलाओं ने बयान दिया कि आरोपी ने खुद उनसे पैसा लिया था।

इन परिस्थितियों को देखते हुए हाईकोर्ट ने कहा कि प्रथम दृष्टया गंभीर आरोप बनते हैं और जमानत देने का कोई आधार नहीं है।

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