दिल्ली स्थित ट्रिब्यूनल के आदेश को चुनौती देने का अधिकार उसी क्षेत्र के हाईकोर्ट को: इलाहाबाद हाईकोर्ट

Update: 2026-04-06 09:19 GMT

इलाहाबाद हाईकोर्ट ने महत्वपूर्ण निर्णय देते हुए स्पष्ट किया कि नई दिल्ली स्थित सशस्त्र बल ट्रिब्यूनल (प्रधान पीठ) के आदेशों को चुनौती देने का अधिकार उसी क्षेत्राधिकार वाले हाईकोर्ट को है, न कि किसी अन्य हाईकोर्ट को।

चीफ जस्टिस अरुण भंसाली और जस्टिस क्षितिज शैलेन्द्र की पीठ ने कहा कि जब आदेश नई दिल्ली स्थित ट्रिब्यूनल की प्रधान पीठ द्वारा पारित किया गया तो इलाहाबाद हाईकोर्ट के पास ऐसे आदेश को सुनने का क्षेत्राधिकार नहीं है।

खंडपीठ ने कहा,

“जब विवादित आदेश नई दिल्ली की प्रधान पीठ से पारित हुआ तो इस हाईकोर्ट के पास उस पर सुनवाई करने का अधिकार नहीं बनता।”

मामले में याचिकाकर्ताओं ने अपने सेवा से निष्कासन के खिलाफ ट्रिब्यूनल की प्रधान पीठ, नई दिल्ली में मूल आवेदन दायर किए और पुनः नियुक्ति की मांग की थी। ट्रिब्यूनल ने उनके आवेदन खारिज कर दिए। इसके बाद कुछ प्रभावित पक्षों ने दिल्ली हाईकोर्ट का रुख किया, जबकि कुछ ने इलाहाबाद हाईकोर्ट में याचिका दायर की।

प्रतिवादी पक्ष ने इलाहाबाद हाईकोर्ट में याचिका की सुनवाई पर आपत्ति जताते हुए कहा कि जब एक ही आदेश को चुनौती दी जा रही है और उसी मामले में दिल्ली हाईकोर्ट में भी कार्यवाही चल रही है तो अलग-अलग हाईकोर्ट में सुनवाई से विरोधाभासी निर्णय आ सकते हैं।

याचिकाकर्ताओं की ओर से तर्क दिया गया कि सेवा में रहते हुए वे उस क्षेत्र के ट्रिब्यूनल में आवेदन कर सकते थे जहां वे कार्यरत थे, और सेवा समाप्त होने के बाद वे अपने निवास स्थान के आधार पर भी याचिका दायर कर सकते हैं। चूंकि वे लखनऊ में रह रहे थे, इसलिए इलाहाबाद हाईकोर्ट में याचिका दायर करना उचित है।

हालांकि, हाईकोर्ट ने सुप्रीम कोर्ट के पूर्व फैसलों का हवाला देते हुए इस तर्क को अस्वीकार कर दिया। विशेष रूप से अदालत ने कहा कि क्षेत्राधिकार का निर्धारण इस आधार पर नहीं किया जा सकता कि याचिकाकर्ता कहां रहते हैं बल्कि यह देखा जाएगा कि आदेश किस पीठ द्वारा पारित किया गया।

अदालत ने सुप्रीम कोर्ट के निर्णय का उल्लेख करते हुए कहा कि अलग-अलग हाईकोर्ट द्वारा एक ही आदेश पर सुनवाई से अस्पष्टता और बहुलता की स्थिति उत्पन्न होगी, जो न्यायिक व्यवस्था के लिए उचित नहीं है।

हाईकोर्ट ने स्पष्ट किया कि मामले के गुण-दोष पर विचार करने से पहले क्षेत्राधिकार का प्रश्न तय करना आवश्यक है। अंततः अदालत ने क्षेत्राधिकार के अभाव में याचिका खारिज की।

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