राम मंदिर चढ़ावे में कथित गड़बड़ी की जांच की मांग पर दो और याचिकाओं पर सुनवाई से हाईकोर्ट का इनकार, कहा- मामला पहले से सुप्रीम कोर्ट में लंबित

Update: 2026-07-10 07:56 GMT

राम मंदिर चढ़ावे में कथित गड़बड़ी की जांच की मांग पर दो और याचिकाओं पर सुनवाई से हाईकोर्ट का इनकार, कहा- मामला पहले से सुप्रीम कोर्ट में लंबित

इलाहाबाद हाईकोर्ट की लखनऊ पीठ ने अयोध्या के राम मंदिर में श्रद्धालुओं के चढ़ावे में कथित गड़बड़ी और धन के दुरुपयोग के आरोपों की जांच की मांग वाली दो और जनहित याचिकाओं पर सुनवाई करने से इनकार किया। अदालत ने कहा कि यही मामला पहले से सुप्रीम कोर्ट में विचाराधीन है, इसलिए समान विषय पर समानांतर कार्यवाही शुरू करने का कोई औचित्य नहीं है।

जस्टिस राजन राय और जस्टिस मंजीव शुक्ला की खंडपीठ ने 7 जुलाई को दोनों जनहित याचिकाओं का निस्तारण करते हुए कहा कि इस विषय पर संविधान के अनुच्छेद 32 के तहत दायर याचिका पहले से ही सुप्रीम कोर्ट में लंबित है।

खंडपीठ ने कहा,

"हम पहले ही यह देख चुके हैं कि यही विषय माननीय सुप्रीम कोर्ट के समक्ष लंबित है। ऐसे में संविधान के अनुच्छेद 226 के तहत समानांतर कार्यवाही शुरू करने का कोई कारण नहीं है। इसलिए इस याचिका पर विचार करने का कोई आधार नहीं बनता।"

हाईकोर्ट ने अपने एक दिन पहले यानी 6 जुलाई के उस आदेश का भी हवाला दिया, जिसमें इसी मामले में केंद्रीय अन्वेषण ब्यूरो से जांच कराने की मांग वाली एक जनहित याचिका पर सुनवाई से इनकार किया गया था।

7 जुलाई को जिन दो नई जनहित याचिकाओं पर सुनवाई हुई, उनमें श्रद्धालुओं द्वारा दिए गए चढ़ावे, उपहार और दान के कथित दुरुपयोग की जांच की मांग की गई।

पहली याचिका गांधीवादी अधिवक्ता विचार मंच की ओर से दायर की गई। इसमें एक स्वतंत्र विशेष जांच दल गठित करने की मांग की गई, जिसकी अध्यक्षता अधिमानतः हाईकोर्ट के रिटायर जज करें, ताकि ट्रस्ट में कथित वित्तीय गड़बड़ी की निष्पक्ष जांच हो सके।

दूसरी याचिका वकील मोतीलाल यादव ने स्वयं पक्षकार के रूप में दायर की। इसमें सुप्रीम कोर्ट या हाईकोर्ट के रिटायर जज की अध्यक्षता में उच्चस्तरीय न्यायिक आयोग गठित कर कथित अनियमितताओं और धन के दुरुपयोग की जांच कराने की मांग की गई।

याचिका में यह भी अनुरोध किया गया कि जांच पूरी होने तक अयोध्या के जिला जज को ट्रस्ट का प्रशासक या रिसीवर नियुक्त किया जाए तथा ट्रस्ट की शक्तियां और बैंक खाते स्थगित कर दिए जाएं।

सुनवाई के दौरान राज्य सरकार की ओर से बताया गया कि इसी विषय पर एक याचिका पहले ही सुप्रीम कोर्ट में लंबित है।

इस पर हाईकोर्ट ने कहा कि जब समान राहत की मांग वाली याचिका सुप्रीम कोर्ट में विचाराधीन है, तब उसी विषय पर हाईकोर्ट में समानांतर सुनवाई उचित नहीं होगी।

इन्हीं टिप्पणियों के साथ इलाहाबाद हाईकोर्ट ने दोनों जनहित याचिकाओं का निस्तारण किया।

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