इलाहाबाद हाईकोर्ट ने कहा कि 'स्मॉल कॉज़ कोर्ट' (छोटी अदालतों) में लंबित मुकदमे को रोकने के लिए CPC की धारा 10 और धारा 151 के तहत दी गई अर्ज़ी को खारिज करने का आदेश, 'प्रोविंशियल स्मॉल कॉज़ कोर्ट्स एक्ट, 1887' की धारा 25 के अर्थ में "तय किया गया मामला" (केस डिसाइडेड) नहीं माना जाएगा।

कोर्ट ने कहा कि चूंकि धारा 25 के तहत रिविज़न (पुनरीक्षण) का उपाय उपलब्ध नहीं था, इसलिए ऐसे आदेश के खिलाफ संविधान के अनुच्छेद 227 के तहत याचिका स्वीकार्य है।

'प्रोविंशियल स्मॉल कॉज़ कोर्ट्स एक्ट, 1887' की धारा 25 हाईकोर्ट को 'स्मॉल कॉज़ कोर्ट' द्वारा किसी मामले में दिए गए डिक्री या आदेश की समीक्षा करने की अनुमति देती है, यदि कोर्ट ने ऐसे अधिकार क्षेत्र का इस्तेमाल किया हो, जो उसे नहीं मिला, या मिले हुए अधिकार क्षेत्र का इस्तेमाल नहीं किया, या अपने अधिकार क्षेत्र का इस्तेमाल करते समय गैर-कानूनी तरीके से या बड़ी अनियमितता के साथ काम किया हो।

CPC की धारा 10 में 'रेस सब ज्यूडिस' (res sub judice) का नियम है, जिसके तहत बाद में दायर मुकदमे को रोक दिया जाता है यदि उसमें शामिल मुख्य और महत्वपूर्ण मुद्दा पहले से चल रही कार्यवाही में भी मुख्य और महत्वपूर्ण मुद्दा हो।

जस्टिस डॉ. योगेंद्र कुमार श्रीवास्तव ने कहा,

"मौजूदा मामले की परिस्थितियों में CPC की धारा 10 और धारा 151 के तहत अर्ज़ी को खारिज करने से केवल 'स्मॉल कॉज़ कोर्ट' की कार्यवाही जारी रहती है। इससे पक्षों के मूल अधिकारों या दायित्वों का कोई फैसला नहीं होता। इसलिए ऐसे आदेश को केवल इसलिए 'प्रोविंशियल स्मॉल कॉज़ कोर्ट्स एक्ट' की धारा 25 के अर्थ में "तय किया गया मामला" नहीं माना जा सकता कि इसे अलग नंबर वाली अंतरिम अर्ज़ी पर पारित किया गया।"

कोर्ट ने कहा,

"यह पैमाना नहीं हो सकता कि कोर्ट ने किसी अर्ज़ी पर आदेश पारित किया है या नहीं; महत्वपूर्ण बात यह है कि क्या आदेश मामले का फैसला है, या किसी ऐसे मामले का फैसला है, जिसमें धारा 25 में इस्तेमाल किए गए शब्दों के दायरे में आने वाला न्यायिक स्वरूप और परिणाम हो।"

Case Title : Smt Raisi Begum and 2 others v. Javed Anwar and 2 others 2026 LiveLaw (AB) 701

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