निर्माता पर कार्रवाई से पहले निरीक्षण और जांच की प्रक्रिया अपनाना अनिवार्य: इलाहाबाद हाईकोर्ट
इलाहाबाद हाईकोर्ट ने कहा कि किसी निर्माता के खिलाफ विधिक माप विज्ञान (पैकेज्ड वस्तु) नियम, 2011 के तहत कार्रवाई करने से पहले नियम 19 और 21 में निर्धारित निरीक्षण एवं परीक्षण की प्रक्रिया का पालन करना अनिवार्य है। इन नियमों की अनदेखी कर की गई कार्रवाई कानूनन टिकाऊ नहीं होगी।
जस्टिस आलोक माथुर ने कहा,
"नियम 19 और 21 में निर्धारित पूर्व शर्तें अनिवार्य हैं। इनका उद्देश्य निर्माता और विक्रेता दोनों के हितों की रक्षा करना तथा यह सुनिश्चित करना है कि केवल वास्तविक दोषी के खिलाफ ही कार्रवाई हो।"
मामला पिडिलाइट इंडस्ट्रीज़ लिमिटेड से जुड़ा था, जो एम-सील फटाफट उत्पाद का निर्माण करती है। कंपनी ने बताया कि इस उत्पाद में एक ही पैकेट के भीतर रेजिन और हार्डनर के दो अलग-अलग पैक होते हैं, जिनका वजन बराबर होता है।
मामले के अनुसार झांसी में विधिक माप विज्ञान विभाग के वरिष्ठ निरीक्षक ने एक खुदरा दुकान का निरीक्षण किया। निरीक्षण के दौरान दावा किया गया कि 25 ग्राम वाले एम-सील फटाफट पैकेट में रेजिन का हिस्सा शून्य पाया गया, जबकि पैकेट पर 12.5 ग्राम रेजिन और 12.5 ग्राम हार्डनर अंकित था। इसे नियम 18(2) का उल्लंघन मानते हुए निर्माता के खिलाफ कार्रवाई शुरू कर दी गई।
कंपनी ने नोटिस का जवाब देते हुए कहा कि खुदरा विक्रेता के यहां निरीक्षण करते समय नियम 21 का पालन नहीं किया गया। इसके बावजूद विभाग ने कार्रवाई जारी रखी और अपील भी खारिज कर दी जिसके बाद कंपनी ने हाईकोर्ट का रुख किया।
हाईकोर्ट ने नियमों का परीक्षण करते हुए कहा कि खुदरा या थोक विक्रेता के यहां निरीक्षण केवल तीन विशेष परिस्थितियों में ही किया जा सकता है। इसके लिए पहले शिकायत होना या सक्षम अधिकारी को पैकेट से छेड़छाड़, रिसाव या गलत घोषणा का संदेह होना आवश्यक है।
अदालत ने पाया कि इस मामले में ऐसी कोई शिकायत दर्ज नहीं थी और न ही निरीक्षण अधिकारी ने यह दर्ज किया कि पैकेट से छेड़छाड़ हुई थी या उस पर दी गई जानकारी गलत थी।
कोर्ट ने कहा कि यदि निरीक्षण के दौरान वजन में कमी पाई गई तो अधिकारी को इसकी सूचना पहले निदेशक को देनी चाहिए। इसके बाद नियम 21 के तहत विधिवत जांच कर आगे की कार्रवाई की जानी चाहिए।
हाईकोर्ट ने यह भी पाया कि रिकॉर्ड में ऐसा कोई स्वतंत्र साक्ष्य नहीं था, जिससे यह साबित हो सके कि रेजिन का वजन वास्तव में कम था। न तो कोई स्वतंत्र गवाह मौजूद था और न ही दुकान मालिक का बयान दर्ज किया गया।
इन सभी तथ्यों को देखते हुए हाईकोर्ट ने कहा कि संबंधित अधिकारियों के आदेश बिना उचित विचार के पारित किए गए। इसलिए अदालत ने दोनों आदेशों को रद्द कर दिया।