पार्टी की सदस्यता छोड़ने पर विधायक की अयोग्यता सिर्फ विधानसभा सदस्यता तक, लोकसभा चुनाव लड़ने पर रोक नहीं: इलाहाबाद हाईकोर्ट
इलाहाबाद हाईकोर्ट ने कहा है कि यदि कोई विधायक स्वेच्छा से अपनी राजनीतिक पार्टी की सदस्यता छोड़ देता है और इसके कारण संविधान की दसवीं अनुसूची के तहत अयोग्य हो जाता है, तो यह अयोग्यता केवल उस सदन की सदस्यता तक सीमित रहती है, जिसका वह उस समय सदस्य था। ऐसी अयोग्यता उसे संसद का चुनाव लड़ने से नहीं रोकती।
जस्टिस राज बीर सिंह ने यह टिप्पणी 78-भदोही लोकसभा सीट से निर्वाचित डॉ. विनोद कुमार बिंद के चुनाव को चुनौती देने वाली याचिका खारिज करते हुए की।
निचली सदन की सदस्यता पर ही लागू होगी अयोग्यता
कोर्ट ने संविधान के अनुच्छेद 102(2) और दसवीं अनुसूची के पैरा 2(1)(a) की व्याख्या करते हुए कहा कि अनुच्छेद 102(2) में किसी व्यक्ति के “सदस्य होने” की अयोग्यता का प्रावधान है, जबकि “चुने जाने” की अयोग्यता का उल्लेख नहीं है।
कोर्ट ने कहा कि यदि कोई विधानसभा सदस्य अपनी पार्टी की सदस्यता स्वेच्छा से छोड़ देता है, तो वह विधानसभा सदस्य के रूप में अयोग्य हो सकता है, लेकिन इससे उसे संसद के चुनाव में उम्मीदवार बनने से अयोग्य नहीं ठहराया जा सकता।
मामला क्या था?
विनोद कुमार बिंद उत्तर प्रदेश विधानसभा में निषाद पार्टी के सदस्य थे। उन्होंने 2024 का लोकसभा चुनाव भाजपा उम्मीदवार के रूप में भदोही से लड़ा और जीत हासिल की।
चुनाव याचिका में दावा किया गया कि उन्होंने निषाद पार्टी से औपचारिक इस्तीफा दिए बिना ही उसकी सदस्यता स्वेच्छा से छोड़ दी थी। इसलिए दसवीं अनुसूची के तहत वह लोकसभा चुनाव लड़ने के लिए भी अयोग्य थे।
हाईकोर्ट ने रवि एस. नाइक बनाम भारत संघ के फैसले का हवाला देते हुए कहा कि पार्टी की सदस्यता स्वेच्छा से छोड़ना केवल औपचारिक इस्तीफे तक सीमित नहीं है और इसे व्यक्ति के आचरण से भी निष्कर्षित किया जा सकता है।
कोर्ट ने माना कि बिंद ने लोकसभा चुनाव का नामांकन दाखिल करने से पहले निषाद पार्टी की सदस्यता स्वेच्छा से छोड़ दी थी। इससे वह अपनी विधानसभा सदस्यता के लिए अयोग्य हो गए थे।
हालांकि, इसका असर लोकसभा चुनाव लड़ने की उनकी पात्रता पर नहीं पड़ा।
अनुच्छेद 102 और 191 की समान व्यवस्था
हाईकोर्ट ने के.एम. मुने गौड़ा बनाम कर्नाटक राज्य के फैसले पर भरोसा किया। इसमें संविधान के अनुच्छेद 191(2) के तहत राज्य विधानमंडल की सदस्यता से जुड़ी अयोग्यता की व्याख्या की गई थी।
कोर्ट ने कहा कि अनुच्छेद 102(2) और 191(2) की व्यवस्था समान है और यह अयोग्यता मौजूदा सदस्यता पर लागू होती है, बाद के चुनाव में उम्मीदवार बनने पर नहीं।
चुनाव याचिका में अन्य आरोप भी खारिज
याचिकाकर्ता ने बिंद के नामांकन, चुनाव चिह्न संबंधी नियमों के उल्लंघन, दो अन्य उम्मीदवारों के नामांकन खारिज किए जाने और कथित रिश्वत/भ्रष्ट आचरण सहित कई आधारों पर चुनाव को चुनौती दी थी।
कोर्ट ने कहा कि चुनाव परिणाम को चुनौती देने के लिए यह बताना जरूरी है कि कथित अनियमितता से चुनाव परिणाम भौतिक रूप से प्रभावित हुआ।
नामांकन संबंधी आरोपों पर कोर्ट ने पाया कि याचिका में आवश्यक ठोस तथ्य नहीं दिए गए थे।
कथित भ्रष्ट आचरण के आरोपों को भी कोर्ट ने पर्याप्त विवरण के अभाव में स्वीकार नहीं किया। अदालत ने कहा कि भ्रष्ट आचरण का आरोप आपराधिक आरोप की प्रकृति का होता है और इसे सटीक तथ्यों के साथ साबित करने योग्य तरीके से प्रस्तुत करना आवश्यक है।
भाजपा के टिकट पर चुनाव लड़ने को लेकर टिप्पणी
कोर्ट ने यह भी कहा कि निषाद पार्टी से इस्तीफा दिए बिना भाजपा के उम्मीदवार के रूप में चुनाव लड़ना “लोकतंत्र के लिए स्वस्थ प्रथा” नहीं कहा जा सकता, लेकिन याचिकाकर्ता के अपने मामले के अनुसार बिंद ने निषाद पार्टी की सदस्यता छोड़ दी थी और इसका कानूनी परिणाम केवल उनकी विधानसभा सदस्यता के संबंध में अयोग्यता था।
अंततः हाईकोर्ट ने माना कि चुनाव याचिका में कोई ऐसा आधार नहीं था जिससे चुनाव को रद्द किया जा सके। कोर्ट ने सीपीसी के आदेश VII नियम 11 के तहत आवेदन स्वीकार करते हुए चुनाव याचिका खारिज कर दी।