स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद के खिलाफ अवमानना याचिका खारिज, इलाहाबाद हाईकोर्ट ने कहा- जमानत रद्द कराने का रास्ता खुला
इलाहाबाद हाईकोर्ट ने ज्योतिर्मठ के शंकराचार्य स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद सरस्वती के खिलाफ दायर अवमानना याचिका खारिज की। याचिका में आरोप लगाया गया कि उन्होंने POCSO मामले में अदालत द्वारा लगाई गई जमानत शर्तों का उल्लंघन किया।
जस्टिस दिनेश पाठक की पीठ ने कहा कि प्रथम दृष्टया अदालत की अवमानना का मामला नहीं बनता। अदालत ने यह भी स्पष्ट किया कि यदि जमानत की शर्तों का उल्लंघन हो रहा है, तो संबंधित पक्ष जमानत निरस्तीकरण याचिका दायर कर सकता है।
यह अवमानना याचिका आशुतोष ब्रह्मचारी महाराज ने दायर की थी। उन्होंने स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद सरस्वती और उनके शिष्य मुकुंदानंद ब्रह्मचारी के खिलाफ कड़ी कार्रवाई की मांग की थी।
दोनों धार्मिक नेताओं पर नाबालिगों के साथ यौन शोषण और गंभीर लैंगिक अपराधों के आरोप लगे हैं।
याचिका में कहा गया कि अदालत ने फरवरी और मार्च 2026 में अग्रिम जमानत देते समय स्पष्ट निर्देश दिए कि आरोपी न्यायिक प्रक्रिया को प्रभावित नहीं करेंगे। इसके बावजूद वे कथित रूप से नाबालिग पीड़ितों के गृह जिलों में सार्वजनिक रैलियां और सभाएं कर रहे हैं।
आरोप लगाया गया कि इन कार्यक्रमों और मीडिया बयानों के जरिए पीड़ितों और उनके परिवारों में डर का माहौल बनाया जा रहा है तथा चल रही न्यायिक प्रक्रिया को प्रभावित करने की कोशिश की जा रही है।
याचिका में यह भी कहा गया कि आरोपी बिना अनुमति विभिन्न जिलों में यात्राएं और जुलूस निकाल रहे हैं तथा मीडिया और सोशल मीडिया के जरिए यह प्रचार कर रहे हैं कि उनके खिलाफ मामले “सरकार के इशारे” पर दर्ज किए गए।
आशुतोष महाराज ने अदालत को बताया कि इन बयानों का उद्देश्य समाज में भ्रम फैलाना, अदालत की निष्पक्षता पर सवाल खड़े करना और न्यायिक प्रक्रिया को प्रभावित करना है, जो अदालत की अवमानना की श्रेणी में आता है।
याचिका में यह भी दावा किया गया कि आशुतोष महाराज की “नाक काटने” पर 21 लाख रुपये का इनाम घोषित किया गया। इसके बाद मार्च 2026 में चलती ट्रेन में उन पर जानलेवा हमला हुआ, जिसमें उन्हें चोटें भी आईं।
इसके अलावा, उन्होंने यह भी आरोप लगाया कि उन्हें पाकिस्तान के एक मोबाइल नंबर से व्हाट्सऐप कॉल के जरिए जान से मारने की धमकी दी गई। कॉल करने वाले ने कथित तौर पर कहा कि यदि मामलों को वापस नहीं लिया गया तो उन्हें और उनके वकील को बम विस्फोट में मार दिया जाएगा।
हालांकि, इन सभी आरोपों के बावजूद हाइकोर्ट ने कहा कि उपलब्ध तथ्यों के आधार पर अवमानना की कार्यवाही शुरू करने का मामला नहीं बनता। अदालत ने याचिका खारिज करते हुए कहा कि यदि जमानत शर्तों के उल्लंघन के पर्याप्त आधार हैं, तो कानून के अनुसार जमानत रद्द कराने की मांग की जा सकती है।