इलाहाबाद हाईकोर्ट ने हत्या की कोशिश के मामले में 42 साल पुरानी अपील को मेरिट के आधार पर खारिज किया, जबकि आरोपी-अपीलकर्ता फरार थी। कोर्ट ने कहा कि वह तब तक हमेशा इंतज़ार करने के लिए बाध्य नहीं है जब तक कि उसे ढूंढकर कोर्ट के सामने पेश न किया जाए।

जस्टिस वाणी रंजन अग्रवाल की बेंच फरार आरोपी फूलमती द्वारा 1982 में दायर क्रिमिनल अपील पर सुनवाई कर रही थी। यह अपील ट्रायल कोर्ट के उसी साल के फैसले के खिलाफ थी, जिसमें उसे IPC की धारा 307 के तहत दोषी ठहराया गया और चार साल की कठोर कैद की सजा सुनाई गई।

11 अगस्त को दिए अपने आदेश में हाईकोर्ट ने कहा कि अपीलकर्ता फूलमती को कोर्ट ने 6 जुलाई 1982 को अपील स्वीकार करते हुए ज़मानत दी और "तब से वह ज़मानत की आज़ादी का आनंद ले रही थी"।

हालांकि, रिकॉर्ड से पता चला कि बाद में वह कोर्ट के सामने पेश नहीं हुई। 2007 और फिर 2013 में जमानती वारंट जारी किए गए।

यह रिपोर्ट मिलने के बाद कि वह अपने दिए गए पते पर नहीं मिल सकी, 2013 में CrPC की धारा 82 और 83 के तहत कार्यवाही शुरू की गई। इसके बाद 2014 में उसके ज़मानतदारों के खिलाफ CrPC की धारा 446 के तहत कार्यवाही शुरू की गई।

कोर्ट ने यह भी कहा कि 2024 में भी "काफी कोशिशों" के बावजूद, संबंधित ज़मानत बॉन्ड नहीं मिल सके और ज़मानतदारों को नोटिस जारी नहीं किए जा सके।

इन हालात को ध्यान में रखते हुए कोर्ट ने कहा:

"मुझे आरोपी-अपीलकर्ता - श्रीमती फूलमती, जो फरार है, उसके ढूंढे जाने और इस कोर्ट के सामने पेश किए जाने की कोई संभावना नहीं दिखती"।

कोर्ट ने यह भी कहा कि आरोपी "इस अपील के निपटारे में दिलचस्पी नहीं रखती है" और उसने गैर-जमानती वारंट और CrPC की धारा 82 के तहत कार्यवाही के बावजूद पेश न होकर "ज़मानत की आज़ादी का गलत इस्तेमाल किया"।

इस स्थिति को देखते हुए कोर्ट ने मुख्य सवाल यह उठाया,

"क्या यह कोर्ट आरोपी-अपीलकर्ता के ढूंढे जाने (अगर ऐसा होता है) और हमारे सामने पेश किए जाने तक हमेशा इंतज़ार करने और इस अपील की सुनवाई को टालते रहने के लिए बाध्य है?"

हाईकोर्ट ने के.एस. पांडुरंगा बनाम कर्नाटक राज्य (2013) मामले में सुप्रीम कोर्ट के फ़ैसले का सहारा लिया, जिसमें ऐसे मामलों के लिए छह सिद्धांत तय किए गए।

अन्य बातों के अलावा, सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि हाईकोर्ट किसी अपील को सिर्फ़ इसलिए खारिज नहीं कर सकता कि उसे आगे नहीं बढ़ाया गया (Non-Prosecution) और उसके गुण-दोष (Merits) की जांच न की जाए, लेकिन अगर अपीलकर्ता या वकील मौजूद नहीं हैं तो कोर्ट मामले को टालने के लिए बाध्य नहीं है।

सुप्रीम कोर्ट ने यह भी कहा कि कोर्ट समझदारी या रियायत के तौर पर मामले को टाल सकता है, लेकिन ऐसा करने के लिए बाध्य नहीं है। वह ट्रायल कोर्ट के रिकॉर्ड और फ़ैसले को देखने के बाद अपील का निपटारा भी कर सकता है।

मौजूदा मामले में उस कानूनी स्थिति को लागू करते हुए इलाहाबाद हाई कोर्ट ने यह निष्कर्ष निकाला:

"के.एस. पांडुरंगा (ऊपर ज़िक्र किया गया) मामले में सुप्रीम कोर्ट द्वारा बताई गई कानूनी स्थिति को देखते हुए मैं अपीलकर्ता- श्रीमती फूलमती के मामले में इस अपील के गुण-दोषों की जांच करने के लिए आगे बढ़ता हूँ..."

कोर्ट ने ट्रायल कोर्ट के रिकॉर्ड को देखने और सरकारी वकील (AGA) की दलीलें सुनने के बाद राज्य के वकील की मदद से मामले के गुण-दोषों पर सुनवाई की और आखिरकार अपील खारिज की।

Case Title - Phulmati vs State 2026 LiveLaw (AB) 660

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