BJP नेता के ग़लत कामों के बारे में सोशल मीडिया पर पोस्ट करने पर सस्पेंड सरकारी टीचर को हाईकोर्ट से राहत

Update: 2026-08-03 04:25 GMT

इलाहाबाद हाईकोर्ट ने सरकारी प्राइमरी स्कूल टीचर का सस्पेंशन रद्द किया, जिन्हें BJP नेता के कथित गलत कामों को उजागर करने वाले सोशल मीडिया पोस्ट के कारण सस्पेंड किया गया था।

जस्टिस मंजू रानी चौहान की बेंच ने कहा कि किसी गलत काम, गबन या जनहित से जुड़े मामले को सामने लाना ही अपने आप में 'दुर्व्यवहार' नहीं माना जा सकता।

इस तरह सिंगल जज ने फिरोजाबाद जिले के विकास खंड एका के प्राइमरी स्कूल, भडाना-II में तैनात एक असिस्टेंट टीचर की रिट याचिका को मंज़ूरी दी, जिसमें उन्होंने फिरोजाबाद के डिस्ट्रिक्ट बेसिक एजुकेशन ऑफिसर (BSA) द्वारा किए गए अपने सस्पेंशन को चुनौती दी थी।

याचिकाकर्ता के अनुसार, उन पर एकमात्र आरोप यह था कि उन्होंने सोशल मीडिया पर उदय प्रताप सिंह के बारे में कुछ पोस्ट अपलोड किए, जो फिरोजाबाद में भारतीय जनता पार्टी (BJP) के जिला अध्यक्ष बताए जाते हैं।

उन्होंने तर्क दिया कि हालांकि डिस्ट्रिक्ट बेसिक एजुकेशन ऑफिसर ने उन्हें पोस्ट हटाने का निर्देश दिया, लेकिन उन्होंने ऐसा करने से इनकार कर दिया, जिसके बाद 4 जुलाई, 2026 का सस्पेंशन ऑर्डर जारी किया गया।

याचिकाकर्ता ने आरोप लगाया कि सस्पेंशन का आदेश BJP जिला अध्यक्ष के "कहने पर" जारी किया गया।

याचिकाकर्ता का कहना था कि उनके सोशल मीडिया पोस्ट को दुर्व्यवहार माना गया, जबकि उन्हें जारी किए गए कारण बताओ नोटिस (Show-Cause Notice) का विस्तृत जवाब और स्पष्टीकरण पहले ही दिया जा चुका था।

याचिकाकर्ता ने तर्क दिया कि इससे सस्पेंशन ऑर्डर जारी करने में सोच-समझकर निर्णय न लेने का पता चलता है, जिससे यह मनमाना, गैर-कानूनी और कानून की नज़र में टिकने लायक नहीं रह जाता।

दोनों पक्षों को सुनने के बाद कोर्ट ने पाया कि सस्पेंशन ऑर्डर का आधार यह आरोप था कि याचिकाकर्ता ने सोशल मीडिया पर BJP जिला अध्यक्ष के कथित गलत कामों को उजागर करने वाले मैसेज पोस्ट किए, और अधिकारियों ने ऐसे व्यवहार को दुर्व्यवहार माना था।

इस मामले पर विचार करते हुए कोर्ट ने कहा:

"प्रथम दृष्टया, कोर्ट की यह राय है कि किसी नागरिक द्वारा संविधान के अनुच्छेद 19(1)(a) के तहत मिली बोलने और अभिव्यक्ति की आज़ादी के मौलिक अधिकार का इस्तेमाल करते हुए किसी गलत काम, गबन या जनहित से जुड़े मामले को सामने लाना, अपने आप में कदाचार नहीं माना जा सकता, जिसके लिए अनुशासनात्मक कार्रवाई की जाए; बशर्ते कि ऐसी अभिव्यक्ति कानून द्वारा प्रतिबंधित न हो या किसी लागू सेवा नियम का उल्लंघन न करती हो"।

इस बात को ध्यान में रखते हुए बेंच ने कहा कि सस्पेंशन का आदेश बरकरार नहीं रखा जा सकता। इसलिए उसे रद्द किया और रिट याचिका को मंज़ूरी दी।

Case - Pradeep Pratap Singh v. State of U.P. & 4 Others 2026 LiveLaw (AB) 512

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