इलाहाबाद हाईकोर्ट ने स्पष्ट किया कि भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम, 1988 की धारा 19 के तहत अभियोजन की मंजूरी (Sanction for Prosecution) की आवश्यकता उस समय लागू कानून से तय होगी, जब कथित अपराध किया गया और FIR दर्ज हुई थी। यह आवश्यकता उस कानून से तय नहीं होगी, जो ट्रायल कोर्ट द्वारा संज्ञान लेने के समय लागू था।

जस्टिस सुभाष विद्यार्थी ने कहा कि यदि कोई अधिकारी FIR दर्ज होने से काफी पहले सेवानिवृत्त हो चुका था और उस समय वह लोक सेवक (Public Servant) नहीं था, तो उसके खिलाफ अभियोजन चलाने के लिए धारा 19 के तहत पूर्व मंजूरी की आवश्यकता नहीं होगी।

कोर्ट ने इस आधार पर चार्जशीट और संज्ञान आदेश रद्द करने की मांग वाली याचिका खारिज कर दी।

क्या था मामला?

याचिकाकर्ता ने CBI द्वारा 28 सितंबर 2018 को दाखिल चार्जशीट और ट्रायल कोर्ट के संज्ञान आदेश को चुनौती दी थी।

यह मामला उत्तर प्रदेश के सात जिलों में वर्ष 2007 से 2010 के बीच मनरेगा (MGNREGA) फंड के कथित दुरुपयोग की जांच से संबंधित था। हाईकोर्ट के निर्देश पर 21 फरवरी 2014 को FIR दर्ज की गई थी।

याचिकाकर्ता उस समय उत्तर प्रदेश लघु उद्योग निगम में कार्यरत था। हालांकि, FIR में उसका नाम नहीं था, लेकिन जांच के दौरान सामने आया कि उसने प्रतिस्पर्धी दरें प्राप्त किए बिना फर्स्ट एड बॉक्स, टेंट और पानी की टंकियों की आपूर्ति के आदेश दिए थे। इसके आधार पर CBI ने उसे चार्जशीट में आरोपी बनाया।

याचिकाकर्ता 30 जून 2009 को सेवानिवृत्त हो चुका था। उसका तर्क था कि जब 2018 में चार्जशीट दाखिल की गई और ट्रायल कोर्ट ने संज्ञान लिया, तब तक भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम की संशोधित धारा 19 लागू हो चुकी थी। इसके बावजूद उसके अभियोजन के लिए आवश्यक मंजूरी नहीं ली गई।

2018 के संशोधन से पहले और बाद की कानूनी स्थिति

हाईकोर्ट ने भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम की धारा 19 के पुराने और संशोधित प्रावधानों पर विचार किया।

कोर्ट ने बताया कि 2018 के संशोधन से पहले धारा 19(1)(c) के तहत धारा 7, 10, 11, 13 और 15 के अपराधों के लिए किसी लोक सेवक के खिलाफ अदालत द्वारा संज्ञान लेने से पहले सक्षम प्राधिकारी की मंजूरी आवश्यक थी। उस समय धारा 2(c) के तहत लोक सेवक की परिभाषा में केवल सेवा में कार्यरत व्यक्ति शामिल थे।

हालांकि, 2018 के संशोधन के बाद धारा 19 में एक स्पष्टीकरण जोड़ा गया, जिसके तहत उस व्यक्ति को भी शामिल किया गया, जिसने कथित अपराध के समय वह पद धारण किया था, लेकिन बाद में उस पद से हट चुका है।

याचिकाकर्ता ने इसी संशोधित प्रावधान का हवाला देते हुए कहा कि चूंकि संज्ञान लेने के समय संशोधित कानून लागू था, इसलिए अभियोजन की मंजूरी अनिवार्य थी।

सुप्रीम कोर्ट के फैसले का हवाला देते हुए हाईकोर्ट ने याचिका खारिज की

हाईकोर्ट ने याचिकाकर्ता की दलील स्वीकार नहीं की। कोर्ट ने State of Telangana v. Mangipet में सुप्रीम कोर्ट के फैसले पर भरोसा किया, जिसमें कहा गया था कि 2018 के संशोधन से पहले दर्ज FIR पर असंशोधित कानून लागू होगा।

कोर्ट ने कहा कि इस फैसले को समन्वय पीठ के समक्ष Dr. Anil Kumar Shukla @ A.K. Shukla v. CBI मामले में प्रस्तुत नहीं किया गया था। उस मामले में समन्वय पीठ ने माना था कि अभियोजन की मंजूरी की आवश्यकता संज्ञान लेने की तारीख से तय होगी।

हाईकोर्ट ने कहा कि समन्वय पीठ का फैसला सुप्रीम कोर्ट के फैसले के विपरीत होने के कारण स्वीकार नहीं किया जा सकता।

जस्टिस सुभाष विद्यार्थी ने कहा:

“मेरे विचार में याचिकाकर्ता के वकील की यह दलील स्वीकार नहीं की जा सकती कि संशोधित अधिनियम लागू होगा क्योंकि यह संज्ञान लेने की तारीख को अस्तित्व में था। मेरा मत है कि अपराध किए जाने और FIR दर्ज होने की तारीख को लागू कानून ही इस मामले को नियंत्रित करेगा, जो उस समय भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम, 1988 का असंशोधित प्रावधान था। चूंकि याचिकाकर्ता FIR दर्ज होने से काफी पहले सेवानिवृत्त हो चुका था और उस तारीख को लोक सेवक नहीं था, इसलिए उसके अभियोजन के लिए मंजूरी प्राप्त करने की आवश्यकता नहीं थी।”

FIR में नाम नहीं होना चार्जशीट रद्द करने का आधार नहीं

याचिकाकर्ता ने यह भी दलील दी कि उसका नाम मूल FIR में शामिल नहीं था।

हालांकि, हाईकोर्ट ने इस तर्क को भी खारिज कर दिया। कोर्ट ने कहा कि यदि जांच के दौरान किसी व्यक्ति की संलिप्तता सामने आती है, तो केवल FIR में उसका नाम नहीं होने के आधार पर उसके खिलाफ दाखिल चार्जशीट रद्द नहीं की जा सकती।

बुढ़ापा और बीमारी कार्यवाही रद्द करने का आधार नहीं

याचिकाकर्ता ने अपनी अधिक उम्र और खराब स्वास्थ्य का भी हवाला दिया था।

इस पर हाईकोर्ट ने कहा कि आरोपी की उम्र और स्वास्थ्य संबंधी स्थिति जमानत आवेदन पर विचार करते समय प्रासंगिक हो सकती है, लेकिन केवल इन आधारों पर आपराधिक कार्यवाही रद्द नहीं की जा सकती।

कोर्ट ने कहा:

“किसी आरोपी व्यक्ति की अधिक उम्र और चिकित्सकीय स्थिति उसे जमानत देने के आवेदन पर विचार करते समय प्रासंगिक हो सकती है, लेकिन यह आपराधिक कार्यवाही रद्द करने का आधार नहीं हो सकती।”

हाईकोर्ट ने संज्ञान आदेश में कोई अवैधता नहीं पाते हुए याचिका खारिज कर दी।

हालांकि, कोर्ट ने निर्देश दिया कि यदि याचिकाकर्ता ट्रायल कोर्ट के समक्ष जमानत आवेदन दाखिल करता है, तो उस पर Satendra Kumar Antil मामले में सुप्रीम कोर्ट द्वारा निर्धारित सिद्धांतों को ध्यान में रखते हुए सहानुभूतिपूर्वक और शीघ्रता से कानून के अनुसार विचार किया जाए।

इस खबर को अंग्रेजी में पढ़ने के लिए क्लिक करें

Tags: