बालिग होने के बाद मुस्लिम पर्सनल लॉ विवाह की अनुमति दे सकता है, लिव-इन संबंध की नहीं: इलाहाबाद हाईकोर्ट

Update: 2026-05-14 12:44 GMT

इलाहाबाद हाईकोर्ट ने महत्वपूर्ण फैसले में कहा कि मुस्लिम पर्सनल लॉ में भले ही बालिग होने के बाद विवाह को मान्यता दी गई हो लेकिन इसका मतलब यह नहीं कि विवाह के बिना लिव-इन संबंध को भी कानूनी स्वीकृति मिल जाती है।

जस्टिस गरिमा प्रसाद ने कहा,

“यदि मुस्लिम पर्सनल लॉ के कुछ मत बालिग होने पर विवाह को मान्यता देते हैं तो वह केवल विवाह से संबंधित है विवाह के बाहर लिव-इन व्यवस्था से नहीं।”

बता दें, यह मामला अंतरधार्मिक जोड़े की याचिका से जुड़ा था। याचिका दायर करने वाली महिला 20 वर्षीय मुस्लिम थी, जबकि पुरुष 19 वर्षीय हिंदू और अनुसूचित जाति समुदाय से संबंधित था। दोनों लिव-इन संबंध में रह रहे थे और उन्होंने अदालत से अपने परिवारों को हस्तक्षेप से रोकने तथा संविधान के अनुच्छेद 21 के तहत जीवन और स्वतंत्रता की सुरक्षा सुनिश्चित करने की मांग की थी।

याचिकाकर्ताओं का कहना था कि महिला के पिता उन्हें संबंध खत्म करने की धमकी दे रहे हैं, जबकि युवक के परिवार को इस रिश्ते से कोई आपत्ति नहीं है।

दोनों ने अदालत को बताया कि वे विशेष विवाह अधिनियम के तहत शादी नहीं कर सकते, क्योंकि युवक की उम्र अभी 21 वर्ष नहीं हुई है। उन्होंने तर्क दिया कि बालिग होने के कारण उन्हें अपनी पसंद के व्यक्ति के साथ विवाह के बिना भी रहने का अधिकार है।

वहीं राज्य सरकार ने याचिका का विरोध करते हुए कहा कि 21 वर्ष से कम आयु का पुरुष कानून की दृष्टि में विवाह के लिए सक्षम नहीं माना जाता। सरकार ने दलील दी कि जब कानून इस उम्र से पहले विवाह की अनुमति नहीं देता, तब अदालत विवाह जैसी व्यवस्था को अप्रत्यक्ष रूप से मंजूरी नहीं दे सकती।

सुनवाई के दौरान हाईकोर्ट ने हिंदू विवाह अधिनियम, विशेष विवाह अधिनियम और बाल विवाह निषेध अधिनियम के प्रावधानों का परीक्षण किया। अदालत ने कहा कि इन सभी कानूनों में 21 वर्ष से कम आयु के पुरुष के विवाह पर रोक है।

इसके बाद अदालत ने यह भी देखा कि क्या मुस्लिम पर्सनल लॉ याचिकाकर्ताओं की मदद कर सकता है। इस पर अदालत ने कहा कि याचिकाकर्ताओं ने कहीं भी यह दावा नहीं किया कि उन्होंने निकाह किया। वे स्वयं स्वीकार कर रहे हैं कि वे विवाह के बिना लिव-इन संबंध में हैं।

अदालत ने कहा,

“जो बात वैध धर्मनिरपेक्ष विवाह या मान्य व्यक्तिगत कानून के तहत विवाह के रूप में हासिल नहीं की जा सकती, उसे अदालत लिव-इन संबंध के रूप में वैध नहीं ठहरा सकती।”

हाईकोर्ट ने यह भी कहा कि लिव-इन संबंध मूल रूप से विवाह जैसी व्यवस्था होती है। यदि कानून किसी निश्चित आयु तक विवाह का अधिकार रोकता है तो अदालत अप्रत्यक्ष रूप से उसी प्रकार के संबंध को अनुमति नहीं दे सकती।

हालांकि, अदालत ने स्पष्ट किया कि यदि याचिकाकर्ताओं को किसी प्रकार की धमकी या हिंसा का सामना करना पड़ता है तो वे पुलिस के पास शिकायत दर्ज करा सकते हैं और ऐसी शिकायत मिलने पर पुलिस को तत्काल कार्रवाई करनी होगी।

अदालत ने यह भी कहा कि सुरक्षा का आदेश माता-पिता, अभिभावकों या वैधानिक अधिकारियों को कानून के तहत कार्रवाई करने से नहीं रोक सकता।

इन्हीं टिप्पणियों के साथ हाईकोर्ट ने याचिका खारिज की।

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