निरीक्षण से पहले नोटिस नहीं देना प्रक्रिया में अनियमितता, अवैधता नहीं; कोई नुकसान न हो तो कार्रवाई वैध: इलाहाबाद हाईकोर्ट

Update: 2026-07-06 07:39 GMT

इलाहाबाद हाईकोर्ट ने फैसला दिया कि स्टांप शुल्क की कमी से जुड़े मामलों में यदि जिला मजिस्ट्रेट बिना संबंधित पक्ष को पूर्व सूचना दिए स्थल निरीक्षण करते हैं, तो यह केवल प्रक्रियात्मक अनियमितता है अवैधता नहीं। अदालत ने स्पष्ट किया कि यदि इससे संबंधित पक्ष को कोई वास्तविक नुकसान या पूर्वाग्रह नहीं हुआ है तो केवल इसी आधार पर पूरी कार्रवाई रद्द नहीं की जा सकती।

जस्टिस सौरभ श्याम शमशेरी ने कहा कि उत्तर प्रदेश स्टांप (संपत्ति का मूल्यांकन) नियमावली, 1997 के नियम 7(3) के तहत कलेक्टर के लिए स्थल निरीक्षण करना अनिवार्य नहीं है। हालांकि, यदि निरीक्षण किया जाता है तो संबंधित पक्षों को पहले नोटिस दिया जाना चाहिए।

अदालत ने कहा,

"यदि निरीक्षण किया जाता है तो संबंधित पक्षों को नोटिस दिया जाना चाहिए लेकिन निरीक्षण रिपोर्ट में इसका कोई उल्लेख नहीं है। इसलिए यह एक अनियमितता है।"

मामला याचिकाकर्ता द्वारा एक ही आराजी के अलग-अलग हिस्सों की तीन बिक्री विलेखों से जुड़ा था। बिक्री विलेखों में भूमि को कृषि भूमि दर्शाया गया और उसी आधार पर स्टांप शुल्क तथा पंजीकरण शुल्क जमा किया गया।

बाद में भारतीय स्टांप अधिनियम की धारा 47ए(3) के तहत जांच में अपर जिला मजिस्ट्रेट ने रिपोर्ट दी कि संबंधित भूमि विस्टा फार्महाउस कॉलोनी के लिंक मार्ग पर स्थित है और कृषि उपयोग में नहीं है। रिपोर्ट में कहा गया कि आसपास की भूमि छोटे-छोटे आवासीय भूखंडों के रूप में बेची जा चुकी है तथा भूमि की चारदीवारी के निर्माण में 60 हजार से अधिक ईंटों का उपयोग किया गया।

सुनवाई के दौरान जिला मजिस्ट्रेट ने 23 जुलाई, 2025 को स्वयं स्थल निरीक्षण किया। निरीक्षण रिपोर्ट में यह उल्लेख नहीं था कि याचिकाकर्ता को निरीक्षण से पहले कोई नोटिस दिया गया। याचिकाकर्ता ने जवाब में दावा किया कि भूमि कृषि कार्य में प्रयुक्त हो रही थी, किसी कॉलोनी का हिस्सा नहीं थी और चारदीवारी केवल भूमि की सुरक्षा के लिए बनाई गई।

इसके बावजूद जिला मजिस्ट्रेट ने 30 जुलाई, 2025 के आदेशों में माना कि भूमि कृषि उपयोग में नहीं थी और उसके चारों ओर आवासीय उपयोग की भूमि थी। एक मामले में बिक्री विलेख को जब्त करते हुए खरीदार पर 20,19,440 रुपये की स्टांप शुल्क की कमी, 2,88,560 रुपये पंजीकरण शुल्क, 5 लाख रुपये का जुर्माना तथा प्रति माह 1.5 प्रतिशत साधारण ब्याज भी लगाया गया।

अपील खारिज होने के बाद याचिकाकर्ता ने हाईकोर्ट का रुख किया।

हाईकोर्ट ने पाया कि याचिकाकर्ता ने निरीक्षण रिपोर्ट का केवल सामान्य रूप से खंडन किया, लेकिन यह साबित करने के लिए कोई ठोस साक्ष्य नहीं दिया कि भूमि वास्तव में कृषि उपयोग में थी। अदालत ने यह भी नोट किया कि यह विवादित नहीं है कि संबंधित भूमि कॉन्टूर बिल्डकॉन प्राइवेट लिमिटेड ने खरीदी थी और उसके आसपास के कम से कम तीन ओर की भूमि भी कंपनी पहले ही खरीद चुकी थी।

अदालत ने कहा,

"याचिकाकर्ता यह तथ्य नकारने का कोई आधार नहीं दिखा सका कि पहले एक ही गाटा के अलग-अलग हिस्से कृषि भूमि बताकर खरीदे गए और फिर कुछ ही समय में उन्हें छोटे-छोटे आवासीय भूखंडों के रूप में बेच दिया गया। ऐसे में यह मानने की पूरी संभावना है कि विवादित भूमि के साथ भी यही तरीका अपनाया जाना था।"

स्टांप शुल्क के निर्धारण के मुद्दे पर हाईकोर्ट ने अपने पूर्णपीठ के फैसले पुष्पा सरीन बनाम उत्तर प्रदेश राज्य का हवाला देते हुए कहा कि किसी भूमि का बाजार मूल्य केवल उसके वर्तमान उपयोग से नहीं, बल्कि इस आधार पर भी तय किया जाएगा कि दस्तावेज निष्पादन के समय या उसके निकट भविष्य में उसका बेहतर और अधिक लाभकारी उपयोग संभव था या नहीं।

इन्हीं आधारों पर हाईकोर्ट ने माना कि याचिकाकर्ता को निरीक्षण से पहले नोटिस नहीं दिया जाना प्रक्रियात्मक अनियमितता जरूर है, लेकिन इससे उसे कोई वास्तविक नुकसान नहीं हुआ। इसलिए इस आधार पर पूरी कार्रवाई को अवैध नहीं ठहराया जा सकता। अदालत ने सभी याचिकाएं खारिज कीं।

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