अदालत में तीखी बहस अवमानना नहीं: इलाहाबाद हाईकोर्ट ने बैठे हुए जज के खिलाफ अवमानना कार्रवाई की मांग खारिज की

Update: 2026-05-13 10:46 GMT

इलाहाबाद हाईकोर्ट ने प्रैक्टिस कर रहे वकील द्वारा दायर याचिका खारिज की, जिसमें हाईकोर्ट के वर्तमान जज जस्टिस सरल श्रीवास्तव के खिलाफ आपराधिक अवमानना की कार्रवाई शुरू करने की मांग की गई।

जस्टिस सलील कुमार राय और जस्टिस देवेंद्र सिंह-प्रथम की खंडपीठ ने स्पष्ट कहा कि किसी गलत आदेश या अदालत में वकील और जज के बीच हुई तीखी बहस को आपराधिक अवमानना का आधार नहीं बनाया जा सकता।

मामले में वकील अरुण मिश्रा ने दावा किया था कि नवंबर, 2025 में उन्होंने एक मामले की सुनवाई से जस्टिस सरल श्रीवास्तव से स्वयं को अलग करने का अनुरोध किया था, क्योंकि उन्हें संबंधित जज पर भरोसा नहीं था।

याचिकाकर्ता के अनुसार इस अनुरोध के बाद जज ने उन्हें अपमानित किया और ऐसी टिप्पणियां कीं जो अदालत की अवमानना के दायरे में आती हैं।

हालांकि, खंडपीठ ने 26 नवंबर 2025 के उस आदेश का अवलोकन किया, जिसमें दर्ज था कि जज ने अधिवक्ता को मामले पर बहस करने के लिए कहा था लेकिन वकील लगातार इस बात पर अड़े रहे कि अदालत मामले को रिलीज करे और उन्होंने बहस से इनकार किया।

इसके बाद एकलपीठ ने वकील के आचरण पर नाराजगी जताई। साथ ही रजिस्ट्रार जनरल को उनके नाम को हाईकोर्ट की सूची से हटाने की प्रक्रिया शुरू करने और मामले को उचित कार्रवाई के लिए बार काउंसिल को भेजने का निर्देश दिया गया।

अवमानना के आरोपों पर हाईकोर्ट ने कहा कि याचिका के समर्थन में दाखिल शपथपत्र में यह स्पष्ट नहीं किया गया कि जज ने आखिर कौन-से शब्द या टिप्पणियां की थीं।

अदालत ने यह भी कहा कि 26 नवंबर के आदेश में भी ऐसी कोई टिप्पणी दर्ज नहीं है, जैसा दावा किया गया।

खंडपीठ ने कहा,

“यदि यह मान भी लिया जाए कि अदालत और वकील के बीच कुछ तीखी बहस हुई थी तब भी वह अवमानना नहीं मानी जाएगी।”

अदालत ने कहा कि ऐसी बहस न तो अदालत की गरिमा को कम करती है और न ही न्याय प्रशासन में बाधा उत्पन्न करती है।

हाईकोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया कि यदि कोई अदालत गलत आदेश पारित करती है तो उसके खिलाफ उचित कानूनी मंच पर चुनौती दी जा सकती है लेकिन उसे अवमानना कार्यवाही का आधार नहीं बनाया जा सकता।

अदालत ने कहा कि अवमानना कार्यवाही में किसी अन्य अदालत के आदेश की वैधता पर फैसला नहीं किया जाता।

वहीं वकील के खिलाफ की गई अनुशंसाओं के संबंध में अदालत ने कहा कि उन्हें भी अवमानना याचिका का विषय नहीं बनाया जा सकता। इसके लिए याचिकाकर्ता के पास अन्य कानूनी उपाय उपलब्ध हैं।

इन टिप्पणियों के साथ हाईकोर्ट ने याचिका को सुनवाई योग्य न मानते हुए खारिज किया।

फैसला सुनाए जाने के तुरंत बाद अदालत ने याचिकाकर्ता की वह मांग भी ठुकरा दी, जिसमें उन्होंने संविधान के अनुच्छेद 134(ए) और 133 के तहत सुप्रीम कोर्ट में अपील की अनुमति मांगी थी।

अदालत ने कहा,

“इस मामले में न तो कोई महत्वपूर्ण विधिक प्रश्न शामिल है और न ही संविधान की व्याख्या से जुड़ा ऐसा मुद्दा, जिस पर सुप्रीम कोर्ट के निर्णय की आवश्यकता हो।”

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