इलाहाबाद हाईकोर्ट का अहम फैसला: पुराने भूमि अधिग्रहण कानून के निरस्त होने के बाद जारी हुई अधिसूचना पर कार्रवाई अवैध
इलाहाबाद हाईकोर्ट ने महत्वपूर्ण फैसला सुनाते हुए कहा कि यदि भूमि अधिग्रहण अधिनियम, 1894 के तहत जारी अधिसूचना पर भले ही 1 जनवरी 2014 से पहले की तारीख अंकित हो, लेकिन उसका प्रकाशन 1 जनवरी 2014 के बाद हुआ है, तो ऐसी पूरी अधिग्रहण प्रक्रिया शुरू से ही अवैध मानी जाएगी। अदालत ने स्पष्ट किया कि पुराने कानून के निरस्त होने के बाद उसके तहत नई अधिग्रहण कार्रवाई शुरू नहीं की जा सकती।
जस्टिस राजन राय और जस्टिस मंजीव शुक्ला की खंडपीठ ने कहा कि अधिसूचना पर लिखी तारीख का कोई कानूनी महत्व नहीं है। महत्वपूर्ण यह है कि उसका राजपत्र, समाचार पत्रों और स्थानीय स्तर पर कब प्रकाशन हुआ। इन सभी में सबसे अंतिम प्रकाशन की तारीख ही अधिसूचना के प्रकाशन की प्रभावी तारीख मानी जाएगी।
अदालत ने कहा,
"अधिसूचना पर अंकित तारीख अप्रासंगिक है। महत्वपूर्ण उसकी वास्तविक प्रकाशन तिथि है और वही यह तय करेगी कि अधिग्रहण की कार्यवाही कब शुरू हुई।"
मामला लखनऊ के सरोजिनी नगर क्षेत्र स्थित गांव अहमामऊ की भूमि से जुड़ा है। याचिकाकर्ता कंपनी ने वर्ष 2007 में इस भूमि का एक हिस्सा पंजीकृत विक्रय विलेख के माध्यम से खरीदा था।
भूमि अधिग्रहण के लिए अधिसूचना पर 27 दिसंबर 2013 की तारीख दर्ज थी लेकिन उसका प्रकाशन 2 और 3 जनवरी 2014 को समाचार पत्रों में 4 जनवरी 2014 को राजपत्र में तथा 6 फरवरी 2014 को स्थानीय स्तर पर सार्वजनिक सूचना के रूप में किया गया। इसके बाद जनवरी 2015 में अधिग्रहण की घोषणा जारी की गई और जुलाई 2016 में अवार्ड पारित हुआ जिसे बाद में वर्ष 2022 में संशोधित किया गया।
याचिकाकर्ता का कहना था कि न तो उसकी भूमि का कब्जा लिया गया और न ही उसे मुआवजा दिया गया। साथ ही पूरी अधिग्रहण प्रक्रिया ऐसे कानून के तहत चलाई गई, जो 1 जनवरी 2014 से निरस्त हो चुका था इसलिए पूरी कार्रवाई शुरू से ही शून्य है।
वहीं विकास प्राधिकरण ने दलील दी कि अधिसूचना पर 27 दिसंबर 2013 की तारीख होने के कारण अधिग्रहण की प्रक्रिया 1 जनवरी 2014 से पहले ही शुरू हो गई। हालांकि वह यह स्वीकार करने से इनकार नहीं कर सका कि अधिसूचना का वास्तविक प्रकाशन नए कानून के लागू होने के बाद हुआ।
हाईकोर्ट ने सुप्रीम कोर्ट के पूर्व फैसलों का हवाला देते हुए कहा कि भूमि अधिग्रहण की प्रक्रिया तभी शुरू मानी जाती है, जब अधिसूचना का विधि के अनुसार प्रकाशन किया जाए। केवल सरकारी स्तर पर लिया गया निर्णय या अधिसूचना पर अंकित तारीख पर्याप्त नहीं होती। जब तक उसका निर्धारित तरीके से प्रकाशन नहीं होता तब तक वह केवल कागजों पर लिया गया निर्णय भर है।
पीठ ने कहा कि 1 जनवरी 2014 से उचित प्रतिकर एवं पारदर्शिता का अधिकार, भूमि अधिग्रहण, पुनर्वासन और पुनर्स्थापन अधिनियम, 2013 लागू हो गया था, जिसके साथ ही वर्ष 1894 का भूमि अधिग्रहण कानून निरस्त हो गया। चूंकि इस मामले में अधिसूचना का पूरा प्रकाशन 1 जनवरी 2014 के बाद हुआ इसलिए पुराने कानून के तहत अधिग्रहण की कार्रवाई वैध रूप से शुरू ही नहीं हुई।
अदालत ने कहा,
"यह वस्तुतः 1 जनवरी 2014 के बाद निरस्त हो चुके अधिनियम 1894 के तहत अधिग्रहण की कार्यवाही शुरू करने का मामला है। इसलिए संबंधित अधिसूचनाएं और पूरी प्रक्रिया कानून की नजर में शुरू से ही शून्य और अवैध हैं।"
हाईकोर्ट ने यह भी कहा कि वर्ष 2013 का कानून भूमि मालिकों को अधिक न्यायसंगत और उचित मुआवजा देने के उद्देश्य से बनाया गया। इसके बावजूद पुराने कानून के तहत कार्रवाई जारी रखकर अधिकारियों ने याचिकाकर्ता के संवैधानिक अधिकारों का उल्लंघन किया।
हालांकि अदालत ने सार्वजनिक हित को देखते हुए पूरी अधिग्रहण प्रक्रिया रद्द नहीं की। अदालत ने कहा कि भूमि का अधिग्रहण सार्वजनिक सड़क निर्माण के लिए प्रस्तावित है और भूमि का हिस्सा भी छोटा है। इसलिए अधिकारियों को निर्देश दिया गया कि वर्ष 2013 के कानून के अनुसार, फैसले की तारीख पर प्रचलित बाजार दर के आधार पर नया मुआवजा निर्धारित किया जाए।
हाईकोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया कि जब तक संशोधित मुआवजे का निर्धारण कर उसका भुगतान नहीं किया जाता तब तक संबंधित भूमि का कब्जा नहीं लिया जाएगा। साथ ही पूरी अधिग्रहण प्रक्रिया छह महीने के भीतर पूरी करने का निर्देश दिया।