दस्तावेज का कोई पन्ना छूट जाने या गलत जगह लग जाने से फैसला समीक्षा योग्य नहीं हो जाता: इलाहाबाद हाईकोर्ट

Update: 2026-07-06 11:41 GMT

इलाहाबाद हाईकोर्ट की लखनऊ पीठ ने महत्वपूर्ण फैसला सुनाते हुए कहा कि केवल किसी दस्तावेज का कोई पन्ना छूट जाने, गलत स्थान पर लग जाने या अभिलेख के साथ संलग्न नहीं होने मात्र से अदालत का फैसला त्रुटिपूर्ण नहीं माना जा सकता।

अदालत ने स्पष्ट किया कि समीक्षा तभी संभव है, जब ऐसी चूक से रिकॉर्ड पर स्पष्ट दिखाई देने वाली कानूनी त्रुटि उत्पन्न हुई हो या उससे न्याय का गंभीर हनन हुआ हो।

जस्टिस करुणेश सिंह पवार ने कहा,

"किसी दस्तावेज के संकलन में किसी पृष्ठ का छूट जाना, गलत स्थान पर लग जाना या संलग्न नहीं होना मात्र इस आधार पर निर्णय को त्रुटिपूर्ण नहीं बनाता। समीक्षा तभी की जा सकती है, जब यह दिखाया जाए कि इस चूक के कारण रिकॉर्ड पर स्पष्ट त्रुटि उत्पन्न हुई, या न्याय का गंभीर हनन हुआ है। केवल प्रक्रियागत अनियमितता या दस्तावेज प्रस्तुत करने में कथित कमी के आधार पर समीक्षा याचिका स्वीकार नहीं की जा सकती।"

मामला सहायक परिचालक (रेडियो संवर्ग) के पद पर नियुक्ति से जुड़ा था। याचिकाकर्ता का दावा था कि आर्थिक रूप से कमजोर वर्ग (EWS) के अंतिम चयनित अभ्यर्थी से अधिक अंक होने के बावजूद उसे इस श्रेणी में चयन के लिए नहीं माना गया।

याचिका खारिज होने के बाद उसने समीक्षा याचिका दायर कर कहा कि अदालत के समक्ष अधूरे और कथित रूप से हेरफेर किए गए लिखित निर्देश प्रस्तुत किए गए, जिनमें उसका EWS प्रमाणपत्र वाला पृष्ठ शामिल नहीं था।

हाईकोर्ट ने कहा कि सुप्रीम कोर्ट पहले ही स्पष्ट कर चुका है कि समीक्षा याचिका केवल सीमित परिस्थितियों में ही स्वीकार की जा सकती है। इनमें ऐसा नया और महत्वपूर्ण तथ्य या साक्ष्य सामने आना शामिल है, जो पूरी सावधानी बरतने के बावजूद पहले उपलब्ध नहीं था, या रिकॉर्ड पर स्पष्ट दिखाई देने वाली त्रुटि हो, अथवा उससे मिलते-जुलते अन्य पर्याप्त कारण हों। समीक्षा, अपील का विकल्प नहीं है और इसके माध्यम से मामले की दोबारा सुनवाई या साक्ष्यों का पुनर्मूल्यांकन नहीं किया जा सकता।

राज्य सरकार की ओर से कहा गया कि याचिकाकर्ता समीक्षा के माध्यम से पूरे मामले की दोबारा सुनवाई कराना चाहता है। सभी आवश्यक दस्तावेज पहले ही अदालत के समक्ष रखे जा चुके थे। साथ ही, उसने मूल आवेदन ही अनारक्षित श्रेणी में किया था।

हाईकोर्ट ने कहा कि यह जांच करना कि संबंधित पृष्ठ मूल अभिलेख का हिस्सा था या उसे जानबूझकर अथवा भूलवश छोड़ा गया, तथ्य और साक्ष्यों के विस्तृत परीक्षण का विषय है, जो समीक्षा याचिका के दायरे में नहीं आता।

अदालत ने यह भी पाया कि संबंधित पृष्ठ मूल अभिलेख का हिस्सा था। साथ ही, याचिकाकर्ता ने आवेदन अनारक्षित श्रेणी में किया और उसके द्वारा अपलोड किया गया EWS प्रमाणपत्र भी निर्धारित प्रारूप में नहीं था।

अदालत ने कहा,

"जब तक त्रुटि स्पष्ट, स्वतः दिखाई देने वाली और बिना किसी विस्तृत तर्क-वितर्क के रिकॉर्ड से सामने न आए, तब तक उसे समीक्षा कार्यवाही में नहीं सुधारा जा सकता। संबंधित पृष्ठ का मुद्दा विस्तृत तथ्यात्मक जांच की मांग करता है, इसलिए वह समीक्षा के स्थापित मानकों पर खरा नहीं उतरता।"

इन टिप्पणियों के साथ हाईकोर्ट ने समीक्षा याचिका खारिज की।

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